हिन्दी आध्यात्मिक लेख : “दास भावना: आत्मा की परम अर्पण यात्रा”
लेखिका : बहन पार्वती जी प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, प्रकाशन तिथि: 24 जून 2025

जब आत्मा जीवन की बाहरी चकाचौंध से ऊबी हुई, भीतर की शांति की खोज में निकलती है, तब वह एक ऐसे मार्ग पर अग्रसर होती है जिसे आध्यात्म कहते हैं। इस मार्ग पर एक अत्यंत मार्मिक, गहन और सुंदर अनुभव होता है — ‘दास भावना’, अर्थात् ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना।
क्या है ‘दास भावना’?
‘दास’ का शाब्दिक अर्थ है – सेवक। परंतु आध्यात्मिक भाषा में यह केवल एक सेवक की स्थिति नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण की अवस्था है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक स्वयं को प्रभु की संपत्ति मानता है, अपने अधिकार, स्वाभिमान और अहम को त्याग कर कहता है —
“मैं नहीं, बस तू ही है।”
यह भावना आत्मा को यह स्मरण कराती है कि वह स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि परम सत्ता का अंश है। यह भावना हमें ईश्वर की इच्छा के समक्ष झुकना सिखाती है — ना कोई शर्त, ना कोई अपेक्षा।
संतों की वाणी में ‘दास भाव’
भक्ति मार्ग के संतों जैसे तुलसीदास, मीराबाई, नामदेव, कबीरदास, और रैदास ने ‘दास भाव’ को ही परम मार्ग माना। तुलसीदास कहते हैं:
“सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।”
यहाँ वे खुद को सेवक मानते हुए, हर जीव में राम का अंश देख प्रणाम करते हैं।
मीराबाई कहती हैं:
“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”
यह वचन दास-भावना की पराकाष्ठा है — जहाँ आत्मा किसी और को अपना मानती ही नहीं, केवल प्रभु ही उसका सर्वस्व होते हैं।
दास भावना और अहंकार का विसर्जन
‘दास भावना’ का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि यह अहंकार का नाश करती है। जहाँ अहंकार होता है, वहाँ ईश्वर का अनुभव संभव नहीं। दास भावना आत्मा को नम्र, सहज और कोमल बनाती है।
यह भाव कहता है —
“हे प्रभु, तू जानता है क्या उचित है, मेरी बुद्धि सीमित है। मैं तेरे आदेश का पालन करूंगा, क्योंकि तू ही मेरा रक्षक, मार्गदर्शक और स्वामी है।”
आधुनिक जीवन में दास भाव का स्थान
आज जब मनुष्य हर बात में ‘मैं’ का आग्रह करता है — “मेरी इच्छा”, “मेरा समय”, “मेरा अधिकार” — तब दास भावना हमें विनम्रता और धैर्य का पाठ पढ़ाती है। यह हमें बताती है कि सच्ची आज़ादी स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि समर्पण में है।
जब हम यह मान लेते हैं कि हर घटना ईश्वर की लीला है, और हम उनके दास हैं — तब जीवन की कटुता, अपमान और कष्ट भी सहन करने योग्य लगने लगते हैं। हम शिकायत नहीं करते, बल्कि शांति से स्वीकार करते हैं।
‘दास भावना’ आध्यात्मिक साधना का वह दीप है, जो भीतर की अंधकारमय गुफाओं को आलोकित करता है। यह कोई दुर्बलता नहीं, अपितु सर्वोच्च बल है — क्योंकि जब हम स्वयं को मिटा देते हैं, तभी ईश्वर स्वयं को प्रकट करता है।
यह भाव कहता है —
“मैं नहीं, तू ही तू। मेरे तन, मन, वचन, कर्म — सब तेरे चरणों में अर्पित हैं।”
और यही आत्म समर्पण, अंततः आत्म मुक्ति का द्वार खोलता है।
शैली: भारतीय आध्यात्मिक परंपरा पर आधारित












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