विश्व मंच पर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मिली ऐतिहासिक पहचान

नई दिल्ली, अप्रैल 2025:
भारत की दो महान सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहरों — भगवद गीता और नाट्यशास्त्र — को यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया जाना न केवल देश के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भारत की अमूल्य ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक वैभव की पुष्टि भी करता है।
क्या है ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’?
यूनेस्को द्वारा स्थापित यह रजिस्टर विश्वभर की उन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों, पांडुलिपियों और ग्रंथों को मान्यता देता है जो मानवता के साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। इस सूची में किसी दस्तावेज़ का सम्मिलित होना, उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाता है।

भगवद गीता: शाश्वत ज्ञान का प्रतीक
भगवद गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है, जो भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच धर्म, कर्म, योग और आत्मा के विषय में संवाद प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि जीवन-दर्शन, नैतिकता और नेतृत्व का भी गहन मार्गदर्शक है।
- रचनाकाल: लगभग 5वीं से 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व
- महत्व: यह ग्रंथ विभिन्न भाषाओं में अनूदित होकर वैश्विक स्तर पर पाठकों को प्रेरित करता रहा है।
- यूनेस्को में मान्यता: भगवद गीता को सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों और मानव चेतना की गहराई के प्रतीक के रूप में मान्यता दी गई है।

नाट्यशास्त्र: विश्व का प्राचीनतम रंगमंचशास्त्र
भारत के महान ऋषि भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र एक ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें नाटक, संगीत, नृत्य, अभिनय, सौंदर्यशास्त्र और मंच-सज्जा का वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। यह न केवल भारत बल्कि विश्व का पहला विस्तृत रंगमंच ग्रंथ माना जाता है।
- रचनाकाल: अनुमानित रूप से 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 2वीं शताब्दी ईस्वी के बीच
- महत्व: इसमें उल्लिखित ‘रस सिद्धांत’ और अभिनय की ‘अभिनय शैलियाँ’ आज भी रंगमंच, सिनेमा और प्रदर्शन कला के मूल आधार हैं।
- यूनेस्को में मान्यता: नाट्यशास्त्र को सांस्कृतिक संवाद और मानव भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति के शास्त्रीय दस्तावेज़ के रूप में सम्मानित किया गया है।
भारत की सांस्कृतिक शक्ति को मिली वैश्विक स्वीकृति
संस्कृति मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के संयुक्त प्रयासों से यह उपलब्धि संभव हुई है। यह मान्यता भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को भी सशक्त बनाती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए इन मूल्यों को संरक्षित रखने की प्रेरणा देती है।
भारत सरकार ने इस अवसर पर घोषणा की है कि इन ग्रंथों के डिजिटल संरक्षण और बहुभाषीय अनुवाद की दिशा में नए प्रयास किए जाएंगे, ताकि विश्वभर के लोग इस ज्ञान का लाभ उठा सकें।
निष्कर्ष
भगवद गीता और नाट्यशास्त्र की यह वैश्विक मान्यता केवल अतीत की महानता का उत्सव नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के लिए भारत के सांस्कृतिक दृष्टिकोण की एक मजबूत नींव है। यह हमारे ज्ञान, कला और आध्यात्मिक दृष्टिकोण की अमरता का प्रतीक है।
April 18 , 2025 | New Delhi | By the team of Boldvoices.in











Leave a reply to satyam rastogi Cancel reply