तुलसीदास और रत्नावली की कहानी

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भारतीय संत परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। उन्हें “रामचरितमानस” जैसे महाकाव्य का रचयिता माना जाता है, जिसने हिंदीभाषी समाज को भक्ति और मर्यादा का अमूल्य मार्गदर्शन दिया। परंतु तुलसीदास के जीवन का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग उनकी पत्नी रत्नावली से जुड़ा है। यही घटना उनके सांसारिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ने का कारण बनी। इस प्रसंग को समझने के लिए हमें तुलसीदास और रत्नावली की विस्तृत कथा पर दृष्टि डालनी होगी।


बचपन और विवाह

तुलसीदास का जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ। जन्म से ही वे असाधारण थे, किंतु बाल्यावस्था में ही माता-पिता के वियोग के कारण उन्होंने कठिन परिस्थितियाँ देखीं। युवावस्था में जब वे बड़े हुए, तो उनका विवाह रत्नावली नामक एक अत्यंत विदुषी और सुंदर स्त्री से हुआ।

रत्नावली बुद्धिमान, दृढ़ स्वभाव की और धार्मिक दृष्टिकोण वाली महिला थीं। तुलसीदास उनसे गहरा स्नेह रखते थे और वैवाहिक जीवन में पूर्णतः रमे हुए थे। वे अपनी पत्नी से इतने मोहग्रस्त थे कि हर समय उनकी छवि मन में बसाए रहते और अक्सर उनके पास पहुँचने के लिए किसी भी हद तक चले जाते।


एक दिन की घटना

एक बार की बात है। रत्नावली अपने मायके गई हुई थीं। तुलसीदास उनसे दूर रह ही नहीं पाते थे। मोह और वियोग में व्याकुल होकर वे रात के समय ही पत्नी से मिलने के लिए निकल पड़े। उस दिन बारिश हो रही थी, नदियाँ उफान पर थीं, अंधेरी रात थी, किंतु तुलसीदास ने किसी बात की परवाह न की।

कहानी में आता है कि उन्होंने रास्ते में बहे हुए शव पर पड़ी लकड़ी को नाव समझकर पार किया और सांप को रस्सी समझकर पकड़ लिया। वे किसी भी प्रकार से अपनी पत्नी तक पहुँच गए। जब रत्नावली ने देखा कि वे ऐसे कठिन हालात में प्राणों की बाज़ी लगाकर केवल उनसे मिलने आए हैं, तो वे आश्चर्यचकित हो गईं।


रत्नावली की सीख

रत्नावली तुलसीदास के गहरे मोह को देखकर दुखी भी हुईं और भीतर से उन्हें झकझोरने का निश्चय किया। उन्होंने तुलसीदास से कहा:

“लाज न आई आपको, जो इस नश्वर शरीर से इतना मोह रखते हैं। यह शरीर हड्डियों, मांस और रक्त का पुतला है। यदि इसी में आपकी इतनी आसक्ति है, तो यदि भगवान श्रीराम के चरणों में वैसा ही प्रेम होता, तो आपका जीवन धन्य हो जाता।”

रत्नावली के ये वचन तुलसीदास के हृदय में बाण की तरह चुभ गए। उन्होंने महसूस किया कि वास्तव में वे क्षणिक और नश्वर आकर्षण में उलझे हुए थे, जबकि उनका जीवन तो भक्ति और भगवान को समर्पित करने के लिए बना है।


जीवन में परिवर्तन

रत्नावली के कठोर किंतु सत्य वचनों ने तुलसीदास का जीवन बदल दिया। उस रात के बाद उन्होंने पत्नी को प्रणाम किया और कहा कि अब वे सांसारिक जीवन छोड़कर रामभक्ति के मार्ग पर चलेंगे। तुलसीदास ने घर-गृहस्थी से मोह त्यागकर स्वयं को श्रीराम की भक्ति में पूर्णतः समर्पित कर दिया।

यही वह मोड़ था जिसने एक सामान्य गृहस्थ को महाकवि और महान संत बना दिया। तुलसीदास ने अपनी लेखनी से “रामचरितमानस”, “कवितावली”, “दोहावली”, “हनुमान चालीसा” और कई अन्य ग्रंथ रचे, जो आज भी करोड़ों भक्तों के लिए मार्गदर्शक हैं।


इस कथा का संदेश

तुलसीदास और रत्नावली की कहानी केवल पति-पत्नी का संवाद नहीं है, बल्कि यह सांसारिक प्रेम और दिव्य प्रेम के बीच का अंतर स्पष्ट करती है।

  • यह दिखाती है कि जब इंसान नश्वर वस्तुओं और व्यक्तियों से मोह करता है, तो उसका जीवन बंधनों में उलझ जाता है।
  • वहीं जब वही प्रेम और समर्पण भगवान की ओर मोड़ा जाता है, तो जीवन धन्य और सफल हो जाता है।
  • रत्नावली के वचन इस बात का प्रमाण हैं कि कभी-कभी कठोर सत्य ही व्यक्ति को उसके वास्तविक पथ पर ले जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास का जीवन हमें सिखाता है कि भले ही शुरुआत में हम सांसारिक मोह-माया में फँसें, परंतु यदि सही समय पर कोई हमें सत्य का बोध करा दे और हम उसे हृदय से स्वीकार कर लें, तो जीवन की दिशा ही बदल सकती है। रत्नावली की एक सीख ने तुलसीदास को इतिहास के महानतम कवि-संतों में से एक बना दिया।


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