संपादकीय: सहजता कौर, नई दिल्ली | दिनांक: 30/07/2025

“तुम हमारे लिए शर्म का कारण हो।”
“काश ऐसा बच्चा कभी पैदा ही न हुआ होता।”
“तुमसे कुछ भी ठीक से क्यों नहीं होता?”
माता-पिता के लिए शायद ये गुस्से के पल हों। लेकिन बच्चे के लिए — ये शब्द उसकी आत्मा में गूंजते रहते हैं, सालों तक उसे भीतर से तोड़ते हैं।
और जो बात इसे और भी दर्दनाक बनाती है वो ये है कि ज़्यादातर माता-पिता मान लेते हैं कि बस वही सही हैं।
वे अपने बच्चों को उन रास्तों पर चलने से रोकते हैं जो उनके दिल से जुड़ते हैं, ये कहते हुए —“तुम जो कर रहे हो, वो फिज़ूल है। वही करो जो हम कहते हैं — वही फायदेमंद है।”
मार्गदर्शन देने की जगह वे नियंत्रण थोपते हैं। सहारा देने की बजाय वे ठुकराते हैं।
और जब बच्चा थोड़ा भी विरोध करता है, तो उसे वह सब याद दिलाया जाता है:
“हमने तुम्हें खाना दिया।”
“हमने तुम्हारी फ़ीस भरी।”
“हमने तुम्हें कपड़े दिलवाए।”
जैसे कि मूलभूत ज़रूरतें पूरी करना — जो हर माता-पिता का कर्तव्य है — किसी भावनात्मक शोषण को सही ठहराने के लिए काफी हो।
खाना, छत, और शिक्षा देना कोई एहसान नहीं है — वो माता-पिता का दायित्व है।
बच्चों को उन चीज़ों के लिए अपराधबोध नहीं करवाना चाहिए जिन पर उनका पूरा अधिकार है।
शायद हममें से हर किसी ने कभी-न-कभी ये बातें सुनी हैं, या किसी को सुनते देखा है।
ऐसे कड़वे शब्द कई घरों में सामान्य हो गए हैं, खासकर पारंपरिक परिवारों में।
लेकिन माता-पिता अक्सर यह नहीं समझ पाते कि उनके शब्दों का असर कितना गहरा होता है।
जो बच्चे लगातार आलोचना और तिरस्कार भरी बातों में पलते हैं, उनके भीतर धीरे-धीरे आत्म-संदेह पनपने लगता है।
वे खुद से कहने लगते हैं:
“शायद मैं सच में बेकार हूं…”
“कोई मुझसे कभी प्यार नहीं करेगा…”
“मेरा यहाँ कोई स्थान नहीं है…”
दुख की बात यह है कि कई बच्चे इस दर्द को वयस्कता तक साथ लेकर चलते हैं।
उनकी ज़िंदगी आत्म-संदेह, बेचैनी और डिप्रेशन जैसी भावनाओं से भर जाती है।
कुछ के लिए ये शब्द उन्हें अंधकार की तरफ़ धकेलते हैं — आत्महत्या के विचार, भावनात्मक दूरी, भाग जाने की इच्छा —
सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्हें कभी घर में अपनापन महसूस नहीं हुआ।
घर बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित जगह होनी चाहिए —
एक ऐसी जगह जहाँ वो खुद को बिना डर के व्यक्त कर सके।
लेकिन अगर घर ही कठोर हो जाए, तो बच्चा कहाँ जाएगा?
अधिकांश असफल पालन-पोषण सिर्फ़ बुरी नीयत से नहीं होते —
बल्कि वहाँ से शुरू होते हैं जहाँ लोग समाजिक दबाव में बच्चे पैदा कर लेते हैं, न कि प्रेम से।
ऐसे घरों में जन्मे बच्चे आलोचना के उस बोझ को लगातार झेलते हैं —
क्योंकि माता-पिता शायद उस जिम्मेदारी के लिए तैयार ही नहीं थे।
उन्हें ये समझने की परिपक्वता नहीं थी कि उस बच्चे को असल में क्या चाहिए था।
आलोचना? नहीं।
हमदर्दी।
उन माता-पिता से एक सवाल:
जब आप अपने बच्चे को ‘लज्जा का कारण‘ कहते हैं,
तो क्या आप उसकी गलती सुधार रहे हैं — या उसके अस्तित्व पर वार कर रहे हैं?
हाँ, बच्चे गलतियाँ करते हैं।
हाँ, वे कई बार निराश भी करते हैं।
लेकिन प्रतिक्रिया कभी भी अपमान नहीं होनी चाहिए — मार्गदर्शन होनी चाहिए।
आप एक बच्चे को बिना उसका आत्म-सम्मान तोड़े भी सुधार सकते हैं।
आप अनुशासन सिखा सकते हैं बिना उसे अपमानित किए।
आप चिंता जाहिर कर सकते हैं बिना उसे मानसिक चोट दिए।
और कृपया बच्चों को तभी जन्म दें जब आप उन्हें धैर्य, ममता और ज़िम्मेदारी से बड़ा करने के लिए तैयार हों।
सिर्फ़ सामाजिक दबाव के कारण नहीं।
क्या आप फिर भी खुद को माता-पिता कहेंगे…
…अगर आपके शब्दों के कारण आपके बच्चे को आत्महत्या के विचार आने लगें?
…अगर वे आपकी अस्वीकृति से तंग आकर घर छोड़ दें?
…अगर वे अपनी पहचान उसी घर में खो दें जहाँ उन्हें सुरक्षित महसूस करना था?
क्या आपका ग़ुस्सा वाक़ई इतना ज़रूरी था कि आपका बच्चा सोचने लगे कि उसे जीने का अधिकार नहीं?
क्या पालन-पोषण सिर्फ़ खाना, छत और शिक्षा देने तक सीमित है?
नहीं!
यह एक इंसान को आकार देने की प्रक्रिया है —
एक ऐसा इंसान जिसमें भावनाएँ हैं, डर हैं, सपने हैं, और संवेदनशीलता है।
यह उन्हें यह महसूस करवाने की प्रक्रिया है कि जब वो आपके आसपास हों, तो वे सुरक्षित हैं।
पालन-पोषण का मतलब है विश्वास का निर्माण —
ताकि जब बच्चा किसी परेशानी में हो, तो सबसे पहले आपके पास ही आए।
और हर उस बच्चे और किशोर के लिए, जो शब्दों के ज़ख्म झेल रहा है:
तुम वो नहीं हो जो उन्होंने तुम्हें कहा।
तुम कोई कलंक नहीं हो।
तुम पर्याप्त हो।
तुम प्रेम, विकास के योग्य हो।
सिर्फ़ इसलिए कि कोई और तुम्हारी क़ीमत न समझ पाया,
इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी क़ीमत नहीं है।
तुम प्रकृति की सबसे सुंदर रचनाओं में से एक हो।
इसलिए खुद को अपनाओ।
खुद से प्यार करो — भले ही और कोई न करे।
अब समय आ गया है कि हम पालन-पोषण के नाम पर भावनात्मक शोषण को सामान्य मानना बंद करें।
इस चक्र को तोड़ना होगा।
हमें एक ऐसी पीढ़ी को बड़ा करना है जिसे अपने बचपन से उबरने की ज़रूरत ही न पड़े —क्योंकि वे अहंकार से नहीं, सहानुभूति से पाले गए थे।
आख़िरकार, हम अपने बच्चों से जो कहते हैं, वही आवाज़ उनके मन की आवाज़ बन जाती है।
तो क्यों न वो आवाज़ कोमल हो?











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