प्रारब्ध: एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण
-लेखक: KSR, Editor at Boldvoices.in | दिनांक: 29 जुलाई 2025

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में प्रारब्ध का विषय अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण माना गया है। यह शब्द संस्कृत के “प्र” और “अरब्ध” शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है – “पूर्व में आरंभ किया गया कर्म”। प्रारब्ध वह भाग्य या परिस्थिति है जिसे हम इस जीवन में भोगने के लिए लाए हैं, जो हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का फल है।
संतों, महात्माओं , ऋषियों का मत है कि मनुष्य का वर्तमान जीवन तीन प्रकार के कर्मों पर आधारित होता है – संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, और क्रियमाण कर्म। संचित कर्म वह है जो हमने कई जन्मों में एकत्र किया है; प्रारब्ध वही है जो इस जन्म में फल देने के लिए तैयार हो चुका है; और क्रियमाण वे कर्म हैं जो हम वर्तमान में कर रहे हैं, जिनका फल हमें भविष्य में मिलेगा।
प्रारब्ध को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति यह होती है कि लोग इसे ‘नियत भाग्य’ मानकर बैठ जाते हैं और प्रयास करना छोड़ देते हैं। परंतु संतो – महात्माओं का यह स्पष्ट मत रहा है कि प्रारब्ध भोगना तो अवश्य है, लेकिन सतसंग, नाम-स्मरण और आत्मबोध के माध्यम से उसका प्रभाव कम किया जा सकता है। जैसे कोई बीज अंकुरित तो होगा, लेकिन यदि समय रहते उस पर ध्यान दिया जाए, तो उसके दुष्प्रभाव को रोका जा सकता है।
संतो – महात्माओं ने यह बताया है कि प्रारब्ध हमारे जीवन की परिस्थितियों को तय करता है – जैसे जन्म कहाँ होगा, माता-पिता कौन होंगे, कौन-से अवसर मिलेंगे, आदि। परंतु यह तय नहीं करता कि हम उन परिस्थितियों में कैसे प्रतिक्रिया देंगे। यही वह स्थान है जहाँ क्रियमाण कर्म और आध्यात्मिक जागरूकता की भूमिका आती है। एक संत पुरुष के जीवन का ही उदाहरण लें – वह भी प्रारब्ध लेकर ही जन्म लेता है, परंतु वह उसका भोग ज्ञानपूर्वक करता है, जिससे वह पुनः कर्मबंधन में नहीं फँसता।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रारब्ध को समझना केवल भाग्य को जानने का विषय नहीं, बल्कि स्व-ज्ञान प्राप्ति का साधन है। जब इंसान यह जान लेता है कि हर परिस्थिति उसके अपने ही कर्मों की प्रतिफल है, तो वह दूसरों को दोष देना छोड़ देता है। तब उसके भीतर क्षमा, धैर्य और संतुलन का भाव उत्पन्न होता है।
इसलिए यह कहा गया है –
“कर्म करे तो धर्म अनुसार, फल की चिंता न कर।
प्रारब्ध है जो आएगा, तू बस सजग रह।”
जो व्यक्ति सतगुरु की शरण में आता है, उसे अपने प्रारब्ध से डरने की आवश्यकता नहीं रहती। सतगुरु उसे वह दृष्टि देते हैं जिससे वह प्रारब्ध का भोग एक साधना के रूप में करता है, और इस जीवन को परम लक्ष्य – ईश्वर-प्राप्ति – की ओर मोड़ देता है।
मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य सतगुरु की शरण में जाकर, सतगुरु की कृपा द्वारा प्रभु के निज स्वरुप को जानकार आत्मबोध प्राप्त करना है और प्रभु के निज स्वरुप की भक्ति करते हुए मुक्ति को, मोक्ष को प्राप्त करना है , अर्थात जन्म – मरण के चक्र से मुक्त होना है।
प्रारब्ध कोई दंड नहीं है, यह आत्मा की यात्रा का वह पड़ाव है जहाँ पूर्व कर्मों का लेखा जोखा पूर्ण हो रहा है। इसका उद्देश्य हमें पीड़ित करना नहीं, बल्कि जागरूक करना है। जो व्यक्ति प्रारब्ध को समझ कर, उसके पार जाने का प्रयास करता है, वही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होता है।











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