ब्रह्मज्ञानी – आध्यात्मिक हिन्दी लेख
Date : 22 जुलाई 2025 | लेखक: KSR, Editor at Boldvoices.in


सनातन परंपरा में ‘ब्रह्मज्ञानी’ शब्द अत्यंत गूढ़ और गंभीर अर्थ लिए हुए है। यह केवल किसी विद्वान या शास्त्रों के ज्ञाता का संकेत नहीं है, बल्कि वह आत्मा है जिसने सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा को प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया है। ब्रह्म को जानने वाला, ब्रह्म में स्थित होने वाला, और ब्रह्म से एक रूप हो जाने वाला साधक ही सच्चे अर्थों में ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है।


ब्रह्मज्ञान की परिभाषा
‘ब्रह्मज्ञान’ का अर्थ है – परमात्मा, परम तत्व का साक्षात् बोध जो नित्य, शाश्वत, अजर, अमर और सर्वव्यापक है। उपनिषदों में कहा गया है – परमात्मा किसी भी सीमा में बंधता नहीं, वह सब कुछ होकर भी सब कुछ से परे है। जब कोई साधक आत्मा और परमात्मा के भेद को मिटाकर स्वयं को परमात्मा का अंश नहीं, परमात्मा का स्वरूप जान लेता है, तब वह ब्रह्मज्ञानी बनता है।


ब्रह्मज्ञानी की पहचान
ब्रह्मज्ञानी की कोई बाहरी पहचान नहीं होती। वह न तो किसी वेशभूषा से पहचाना जा सकता है और न ही किसी पद या प्रतिष्ठा से। वह भीतर से शांत, सम और प्रेममय होता है। ब्रह्मज्ञानी का स्वभाव सहज होता है, और वह सदा निर्भय होता है। वह न किसी से घृणा करता है, न मोह करता है। उसका चित्त स्थिर और निर्मल रहता है, और वह समदृष्टि रखता है।

जहाँ ज्ञान होता है वहाँ अक्सर अहंकार भी आ जाता है, लेकिन ब्रह्मज्ञान के साथ अहंकार नहीं टिकता। ब्रह्मज्ञानी जानता है कि यह शरीर, बुद्धि, मन – सब माया के खेल हैं। जब उसने उस ‘मैं’ का त्याग कर दिया है, जो सीमित था, तब वह स्वयं को एक विराट अस्तित्व के रूप में देखता है। वह कर्तापन के भाव से भी मुक्त होता है।


ब्रह्मज्ञानी का जीवन और आचरण
ब्रह्मज्ञानी का जीवन लोकहित और परमार्थ को समर्पित होता है। वह न किसी धर्म को नकारता है, न किसी मत को छोटा समझता है। उसके लिए सभी प्राणी एक हैं। वह किसी से द्वेष नहीं करता, और न किसी की निंदा करता है। उसका जीवन एक जलती हुई लौ के समान होता है, जो खुद जलती है पर दूसरों को प्रकाश देती है।


ब्रह्मज्ञान केवल सद्गुरु कृपा द्वारा ही संभव
ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिए सद्गुरु की आवश्यकता होती है – जो स्वयं ब्रह्म के साक्षात्कार से युक्त हो और शिष्य को भी उसी मार्ग पर ले जाए। कबीरदास ने कहा है:

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय,
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।”

गुरु ही ब्रह्म के स्वरूप से परिचित कराता है, इसलिए ब्रह्मज्ञानी बनने का प्रथम चरण है – सतगुरु की शरण लेना।


ब्रह्मज्ञानी और मोक्ष
जहाँ सामान्य साधक जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है, वहीं ब्रह्मज्ञानी इस चक्र से मुक्त होता है। ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति से आत्मा को अपने निज स्वरुप परमात्मा की पहचान हो जाती है और ब्रह्मज्ञानी कण – कण में परमात्मा को देखते हुए , इसका अहसास करते हुए भक्ति करता है और अंतत : जीवन मरण के चक्र से बच जाता है और मुक्ति को मोक्ष को प्राप्त होता है जो की मनुष्य जीवन का लक्ष्य है।


ब्रह्मज्ञानी होना किसी उपाधि या प्रमाणपत्र से तय नहीं होता। यह एक आंतरिक अवस्था है – एक जीवित अनुभव। ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष युगों-युगों में अवतरित होते हैं, और समाज को दिशा देते हैं। उनके दर्शन मात्र से भी मन शुद्ध हो जाता है। हमारा उद्देश्य यही होना चाहिए कि हम सत्संग, सेवा, और सुमिरण के माध्यम से अपने भीतर ब्रह्मज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करें।


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