सतगुरु मुक्ति दाता है : आध्यात्मिक लेख
लेखक: KSR, Editor at Boldvoices.in दिनांक: 18 जुलाई 2025

सतगुरु का स्थान भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति में अत्यंत ऊँचा और पूजनीय रहा है। संतों और महापुरुषों ने युगों-युगों तक एक स्वर में यह कहा है कि मनुष्य जीवन की वास्तविक सिद्धि तब ही संभव है जब वह एक सच्चे सतगुरु की शरण में आता है। सतगुरु वह होता है जो स्वयं परम सत्य को अनुभव कर चुका होता है और उस अनुभव का प्रकाश दूसरों को भी देता है। वह केवल एक धार्मिक प्रवचनकर्ता या ज्ञानी नहीं होता, बल्कि वह एक जीवित जागृत सत्ता होता है जो मनुष्य को अज्ञान, मोह, भ्रम और अंधकार से निकालकर ज्ञान, भक्ति और मुक्ति की ओर ले जाता है।
मुक्ति का अर्थ केवल मृत्यु के बाद किसी लोक में जाना नहीं है। मुक्ति का वास्तविक अर्थ है—मन, बुद्धि, अहंकार और इच्छाओं के बंधनों से मुक्त होकर आत्मा को उसके मूल स्वरूप का बोध कराना। जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानकर भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे दौड़ता है, तब वह अनेक कष्टों और दुखों में उलझ जाता है। यही सांसारिक बंधन उसे बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसाए रखते हैं। लेकिन जब सतगुरु कृपा करके आत्मा को ब्रह्मज्ञान प्रदान करता है और ईश्वर का साक्षात्कार कराता है, तभी सच्ची मुक्ति का आरंभ होता है।
सतगुरु की कृपा से मनुष्य को यह बोध होता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर जीव में, हर अणु में समाया हुआ है और स्वयं हमारे भीतर भी वही परम शक्ति विद्यमान है। यह ज्ञान जब हृदय में जागता है तो व्यक्ति जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने लगता है। फिर उसका धर्म केवल कर्मकांडों या परंपराओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका हर कर्म एक पूजा बन जाता है। यही वह मोड़ होता है जहाँ से आत्मा मुक्त होने लगती है। सतगुरु की दी हुई यह दृष्टि, यह चेतना और यह नामस्मरण ही मुक्ति का सच्चा द्वार है।
संत कबीर ने कहा था—”गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।” यह वाणी इस बात को स्पष्ट करती है कि सतगुरु ईश्वर से भी महान होता है, क्योंकि वही हमें ईश्वर का मार्ग दिखाता है, उसके दर्शन कराता है। इसी प्रकार अन्य संतों ने भी बार-बार यह बताया है कि बिना सतगुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं मिलती।
आज के युग में, जब मनुष्य अत्यधिक भटकाव, तनाव और संघर्ष में जी रहा है, तब एक सच्चे सतगुरु की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। ऐसे युग में यदि कोई महापुरुष हमें ब्रह्मज्ञान देकर हमारे भीतर ईश्वर का अनुभव करा सके और हमारे जीवन को संतुलित बना सके, तो वही सच्चे अर्थों में “मुक्ति दाता” कहलाता है। सतगुरु हमें बताता है कि संसार छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी हम आत्मिक उन्नति कर सकते हैं। वह न तो संन्यास का आदेश देता है और न ही भोग-विलास की ओर ले जाता है। वह तो हमें संतुलन सिखाता है—भक्ति और व्यवहार का समरस मार्ग।
सतगुरु की शरण में आने से व्यक्ति के जीवन में केवल आध्यात्मिक परिवर्तन नहीं होता, बल्कि उसका व्यवहार, सोच, संबंध और कार्यशैली भी बदल जाती है। वह संसार के बीच रहकर भी उसमें लिप्त नहीं रहता। वह सेवा, प्रेम, नम्रता और समर्पण के भाव से भर जाता है। सतगुरु की वाणी उसका मार्गदर्शन बन जाती है और सतगुरु का स्मरण उसकी साधना।
अंततः यही कहा जा सकता है कि सतगुरु के बिना जीवन एक अधूरी यात्रा है। सतगुरु ही वह दीपक है जो आत्मा के अंधकार को मिटाता है और उसे सच्चे प्रकाश की ओर ले जाता है। वह केवल मार्ग नहीं दिखाता, वह उस मार्ग पर चलना भी सिखाता है और साथ ही चलते हुए हर मोड़ पर संभालता भी है। इसलिए कहा गया है – “सतगुरु बिना भवसागर पार न होई।” जो व्यक्ति सतगुरु की शरण में आता है, वही सच्चा अर्थों में मुक्ति को प्राप्त करता है।
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