– श्रीराम के गुणों का गान
Curated by the team of Boldvoices.in🗓️ 30 जून 2025

“चौथि भगति मम गुन गन करइ, कपट तजि गान।
चित्त द्रढ़ भरोस हिय हरष, सदा करइ गुण गान।।”
– श्रीरामचरितमानस, अरण्यकाण्ड
श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति के नौ रूपों का परिचय कराया, जिसमें चौथी भक्ति का स्वरूप अत्यंत मधुर और मार्मिक है – ईश्वर के गुणों का कपटरहित गान। यह भक्ति केवल मुख से किए गए गायन तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह हृदय की गहराई से निकली हुई वह भावना होती है, जो प्रभु के प्रेम, करुणा, शील और शौर्य की स्तुति करती है। जब कोई भक्त निष्काम भाव से भगवान के गुणों का स्मरण और गान करता है, तो वह गुणगान स्वयं एक साधना बन जाता है।
यहाँ “गान” का अर्थ केवल भजन गाना नहीं, बल्कि भगवान की लीला, उनके चरित्र, और उनके दिव्य स्वभाव का चिंतन, मनन और प्रचार करना भी है। भक्त जब राम की मर्यादा, दया, प्रेम, और न्याय की बात करता है, तो वह अपने जीवन को भी उन्हीं गुणों में ढालने लगता है। यही गुणगान की सच्ची सार्थकता है – जब शब्द जीवन बन जाएं, और भाव व्यवहार में उतर आएं।
“कपट तजि गान” – यह वाक्य इस भक्ति का सबसे गूढ़ पक्ष है। ईश्वर केवल उसी का गान स्वीकार करते हैं जो निष्कपट, स्वार्थरहित और निर्मल चित्त से किया गया हो। दिखावे, अहंकार या केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए किया गया भजन, भक्ति नहीं कहलाता। भक्ति वहाँ है जहाँ प्रेम है, समर्पण है, और जहां ‘मैं’ का कोई अस्तित्व नहीं।
ऐसी ही भावभक्ति को संतों ने युगों से अपनाया और सिखाया। कबीर कहते हैं –
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।”
सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास जैसे भक्तों का जीवन इसी गुणगान से आलोकित रहा। उन्होंने न केवल प्रभु के गुणों को गाया, बल्कि स्वयं को उन गुणों में समर्पित कर दिया।
इस भक्ति को अपनाने के लिए जरूरी है कि हम प्रभु की महिमा को पढ़ें, सुनें, गाएं और समझें। रामचरितमानस, भागवत, पुराणों में जो लीलाएं वर्णित हैं, वे केवल कथा नहीं, जीवन के मार्गदर्शक हैं। जब हम राम के प्रेम और त्याग की बात करते हैं, तो हमारा मन भी उन्हीं गुणों की ओर झुकने लगता है। यही तो भक्ति की शक्ति है – जो गाया जाता है, वही जिया जाता है।
इसलिए, चौथी भक्ति का अभ्यास केवल संगीत या उच्चारण नहीं, बल्कि भावपूर्ण स्मरण है। यह वह दीप है, जो मन के अंधकार को प्रभु के गुणों की रौशनी से आलोकित करता है। जब हम प्रेमपूर्वक श्रीराम के गुणों को गाते हैं, तब वह गुण हमारे भीतर उतरते हैं, और यही आत्मा की सच्ची यात्रा है – प्रभु से मिलने की यात्रा।
राम का गुणगान जो भी ग्रन्थ करते हैं , वे ग्रन्थ भी पूज्य हो जाते हैं , जैसे वेदादि ग्रन्थ । जो भक्त ऐसा करेंगे , भला वे क्यों ना पूज्य , वन्दनीय और अभिनन्दनीय हो जाएंगे । वास्तविकता तो यह है की प्रभु गुणगान करने से भक्ति में दृढ़ता आती है।
इस प्रकार निर्गुण – सगुण प्रभु के गुणगान यदि निष्कपट भाव से किए जाएं तो प्रभु प्रेम दृढ़ होता है , माया – मोह धीरे – धीरे समाप्त होकर भक्त का जीवन पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाता है . तभी गोस्वामी जी ने ‘प्रभु – गुणगान ‘ अर्थात हरी – गुण चर्चा को भक्ति के अन्तगर्त चौथा स्थान देकर इसकी महिमा को स्थापित किया है।












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