भरोसे और रणनीति की एक बेचैन कर देने वाली दास्तान
Curated by the team of Boldvoices.in Date: 12 June 2025

विश्व कूटनीति के रंगमंच पर भरोसा किसी खजाने से कम नहीं। पर आज भारत एक गहरा प्रश्न पूछने को मजबूर है — क्या अमेरिका पर सच में भरोसा किया जा सकता है? मित्रता के ऊँचे दावों के बावजूद, बार-बार अमेरिका का पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक समर्थन देना चिंता को जन्म देता है। ये कदम न केवल भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि दक्षिण एशिया में शांति विरोधी ताकतों को भी ताक़त देते हैं।
विश्व बैंक और IMF जैसे वैश्विक संस्थानों के ज़रिए पाकिस्तान को आर्थिक राहत देना, और रावलपिंडी की सेनाओं तक अमेरिका के हथियार पहुँचना — ये भारत के हितों और बलूचिस्तान-अफगानिस्तान के शोषित लोगों के लिए दोहरा आघात है। ऐसे में सवाल उठता है — क्या भारत को अपनी पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति और रणनीतिक स्वायत्तता के रास्ते पर चलते रहना चाहिए, या अब वक्त आ गया है कि रिश्तों की लकीरें दोबारा खींची जाएं?
अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों की परेशान करने वाली हकीकत
अमेरिका खुद को लोकतंत्र का प्रहरी और आतंकवाद का दुश्मन बताता है। फिर भी, पाकिस्तान के साथ उसका रिश्ता विरोधाभासों से भरा हुआ है। ओसामा बिन लादेन से लेकर लश्कर-ए-तैयबा तक, पाकिस्तान ने जिन आतंकवादी नेटवर्कों को पनाह दी, उसी पाकिस्तान को अमेरिका बार-बार अरबों डॉलर की मदद देता रहा है।
साल 2025 में भी IMF ने पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचाने के लिए नया राहत पैकेज मंजूर किया, जिसमें वॉशिंगटन का समर्थन स्पष्ट था। यह मदद ‘क्षेत्रीय स्थिरता’ के नाम पर दी गई, पर सच्चाई यह है कि इसी सहायता से पाकिस्तान अपनी सेना को मज़बूत करता है — जिसका निशाना अक्सर भारत होता है।
जो हथियार अमेरिका पाकिस्तान को सीमा सुरक्षा या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर देता है, वे घाटी में घुसपैठ, बलूचों और पश्तूनों पर कार्रवाई जैसे कृत्यों में इस्तेमाल होते हैं। भारत के लिए यह सिर्फ कूटनीतिक चिंता नहीं, एक सीधा सुरक्षा खतरा है।
रणनीतिक उपेक्षा का पैटर्न
अमेरिका की दोहरी नीति केवल धन या हथियारों तक सीमित नहीं। वैश्विक मंचों पर भी वह या तो चुप रहता है या पक्षपातपूर्ण रुख अपनाता है। पाकिस्तान के आतंकवाद में हाथ पर चुप्पी, संघर्षविराम उल्लंघनों पर मौन और भारत की आपत्ति के बावजूद सैन्य छूट देना — यह सब एक स्पष्ट पैटर्न बनाता है जिसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
भारत ने वर्षों से अमेरिका के साथ संवाद का द्वार खुला रखा, संयुक्त सैन्य अभ्यास किए, और वैश्विक संकटों में उसका साथ दिया। लेकिन जब भारत के मूलभूत हितों की बात आती है, तब अमेरिका की दृष्टि अक्सर सीमित दिखती है।
क्या भारत को तटस्थ रहना चाहिए?
भारत की विदेश नीति हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता पर टिकी रही है — नेहरू के गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर आज की बहुपक्षीय कूटनीति तक। इसने भारत को रूस से लेकर अमेरिका तक, ईरान से लेकर इज़राइल तक सभी से मित्रता बनाए रखने की ताक़त दी है।
लेकिन तटस्थता का अर्थ निष्क्रियता नहीं होता। यदि कोई कथित मित्र बार-बार आपके हितों के विरुद्ध कार्य करे, तो क्या उसे वही विश्वास और सहयोग मिलना चाहिए?
आज की वैश्विक व्यवस्था बीते युग जैसी नहीं। अमेरिका-चीन के नए शीत युद्ध और रूस-ईरान-चीन की उभरती धुरी के दौर में भारत को अपनी साझेदारियों में अधिक स्पष्टता और साहस दिखाने की आवश्यकता है।
अब समय है रिश्तों के पुनर्मूल्यांकन का, न कि अलगाव का
भारत को अमेरिका से रिश्ते तोड़ने की ज़रूरत नहीं, पर उन्हें नए आधार पर परिभाषित करने की ज़रूरत ज़रूर है — सिद्धांत आधारित व्यावहारिकता के साथ। यदि वॉशिंगटन भारत को एशिया में रणनीतिक साझेदार मानता है, तो उसे उन ताकतों को समर्थन देना बंद करना होगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत की संप्रभुता के विरुद्ध हैं।
भारत को चाहिए कि वह:
- पाकिस्तान को दी जाने वाली वैश्विक सहायता की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करे।
- रक्षा और तकनीकी सहयोग में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे।
- फ्रांस, जापान, ASEAN जैसे भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग को गहरा करे।
- रूस, ईरान और वैश्विक दक्षिण से पारंपरिक मित्रता को बिना किसी अमेरिकी दबाव के मज़बूत बनाए।
- अफगान प्रतिरोध और बलूच आवाज़ों के साथ एक क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी धुरी का समर्थन करे, ताकि पाकिस्तान की आंतरिक दमनकारी नीतियाँ उजागर हों।
निष्कर्ष: भविष्य की राह
इतिहास गवाह है कि भारत ने सबसे अच्छा प्रदर्शन तब किया है जब वह अपने आत्मबल पर टिका रहा, किसी एक ध्रुव की ओर झुकने के बजाय संतुलन साधा। अमेरिका एक शक्ति है, पर पाकिस्तान को बार-बार दी गई छूट ने उसे भारतीय जनमानस में खोखला कर दिया है।
अब भारत को कूटनीति को आशा का मंच नहीं, बल्कि एक शतरंज की बिसात मानना होगा — जहाँ हर चाल का मोल है। मित्रता स्वाभिमान की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। रणनीतिक साझेदारी आँख मूंदकर नहीं, और भरोसा — अगर डगमगाए — तो उसे दोबारा अर्जित करना चाहिए, न कि याचना करना।
समय आ गया है कि भारत तटस्थता को त्यागे नहीं, बल्कि उसे नये रूप में अपनाए —
बुद्धिमत्ता से भरी तटस्थता। शर्तों के साथ साझेदारी।और स्पष्टता से परिभाषित मित्रता।
जब भारत अपनी राह स्वयं चुनेगा, तभी दुनिया उसे सही अर्थों में सम्मान देगी।
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धर्म और कूटनीति से संचालित एक सशक्त भारत के लिए।











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