आध्यात्मिक लेख

✍️ By Sehajta Kaur, Editor at Boldvoices.in 📅 दिनांक: 12 जून 2025


जब आत्मा अपने स्रोत की ओर लौटती है, तब जीवन में एक अनकही शांति उतरती है। यही यात्रा है — रूहानियत से इंसानियत की ओर। यह मार्ग सिर्फ पूजा-पाठ या कर्मकांड से नहीं, बल्कि सतगुरु की कृपा से ईश्वर को पहचान कर आरंभ होता है। जब इंसान ईश्वर को सिर्फ किताबों में नहीं, हर प्राणी में देखना शुरू करता है, तभी सच्ची रूहानियत जन्म लेती है। परमात्मा की जानकारी से सभी भ्रमों का शंकाओं का अंत होता है।

कह कबीर मेरी संसा नासी , मैं सर्व निरंजन डीठा ।

जिस क्षण मनुष्य जान लेता है कि परमात्मा कोई दूर की चीज नहीं, बल्कि उसके भीतर है, सर्वत्र है, उसी क्षण उसका व्यवहार संसार के प्रति बदल जाता है। अब वह किसी की जाति, धर्म, भाषा या रंग नहीं देखता; वह हर किसी में परमात्मा को देखता है। जो प्रभु को जान लेता है , पहचान लेता है उसे आत्मबोध हो जाता है की मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ और आत्मा तो परमात्मा की अंश है, शरीर नाशवान है आत्मा नहीं । जब मनुष्य इस जागरूकता से जीवन जीता है तो जीवन में सहजता आती है।

आठ पहर रहे इक रंगा , प्रभु को जाने सदा ही संगा।

रूहानियत का वास्तविक स्वरूप है — नम्रता, सहिष्णुता और सेवा। जब हम इस सच्चे ज्ञान से परिचित होते हैं कि हम सब एक ही परमसत्ता की संतान हैं, तो हमारी दृष्टि में कोई ऊँचा-नीचा नहीं रहता। तब कोई भूखा हो, प्यासा हो या दुखी — हम उसकी सेवा को अपनी पूजा समझते हैं।

रूहानियत हमें जोड़ती है, बांटती नहीं। वह कहती है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च — सब रास्ते हैं एक परम सत्य ईश्वर तक पहुँचने के। लेकिन यह मार्ग तब ही सार्थक होता है जब हमारी पूजा, हमारी वाणी और हमारा आचरण — तीनों में समरसता हो।

जब मनुष्य अपने भीतर की रोशनी से परिचित हो जाता है, तो बाहरी चमक उसकी आंखों को चकाचौंध नहीं कर पाती। तब वह किसी की मदद करता है, तो किसी इनाम या प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि निःस्वार्थ सेवा उसे उसका फर्ज लगता है। ऐसा इंसान सदैव यही प्रार्थना करता है:

सबका भला करो भगवान् , सबका सब विधि हो कल्याण ।

आज के समय में जहाँ मशीनें जुड़ती जा रही हैं और दिल बंटते जा रहे हैं, रूहानियत ही वह शक्ति है जो हमें फिर से एकसूत्र में पिरो सकती है। सतगुरु की कृपा से जब इंसान अपने भीतर और सर्वत्र परमात्मा को देख लेता है, तभी वह दूसरे में भी वही ज्योति पहचान पाता है। तभी वह कह सकता है — “मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है।”

इसलिए ज़रूरत है कि हम रूहानियत को सिर्फ साधना तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन का आधार बनाएं। जब हमारे विचार, व्यवहार और व्यापार — तीनों में सत्य, करुणा और प्रेम बस जाए, तब हम सही अर्थों में इंसान बनते हैं। और यही है रूहानियत से इंसानियत की यात्रा — एक शांत, सुंदर और समर्पित जीवन की ओर।

जहाँ आत्मा जागती है, वहीं से इंसानियत खिलती है।


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