आध्यात्मिक लेख : नवधा भक्ति तीसरी भक्ति: ‘गुरु पद पंकज सेवा’ का आध्यात्मिक रहस्य
लेख: Curated by the team of Boldvoices.in तारीख: 4 जून 2025

“गुरु पद पंकज सेवा – यह भक्ति की तीसरी सीढ़ी है, जहां आत्मा गुरु के चरणों में समर्पण की पूर्ण परिभाषा बन जाती है।”

🌸 भूमिका
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा श्रीरामचरितमानस में वर्णित नवधा भक्ति का प्रत्येक सोपान आत्मा को ईश्वर से मिलाने की प्रक्रिया है। इन नौ मार्गों में तीसरी भक्ति—‘गुरु पद पंकज सेवा’—एक ऐसा सुंदर और भावपूर्ण सोपान है जिसमें शिष्य अपने गुरु के चरणों में न केवल सेवा अर्पित करता है, बल्कि अपने अहंकार, संदेह और अस्थिरता को भी वहां अर्पित करता है।

🌿 तीसरी भक्ति क्या है?
प्रभु श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का वर्णन करते हुए तीसरी भक्ति को इस प्रकार कहा:
“गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भक्ति अमान।”
अर्थात – गुरु के चरणों की सेवा करना, और साथ ही अपने मन से अभिमान को त्याग देना – यही तीसरी भक्ति है।

🌼 सेवा का अर्थ केवल शारीरिक श्रम नहीं होता। यह वह आंतरिक भावना है जिसमें शिष्य अपनी इच्छाएं, विचार और कर्म—सब कुछ गुरु की प्रेरणा में समर्पित कर देता है। गुरु के आदेश को ईश्वर की वाणी मानकर उसका पालन करना, उनके आदर्शों को जीवन में उतारना और अपने हृदय को उनके चरणों में स्थिर करना – यही सच्ची सेवा है।

🌺 ‘अमान’ का रहस्य
‘अमान’ यानी ‘अहंकार का त्याग’। यह भक्ति तभी सार्थक होती है जब सेवा में अभिमान नहीं, विनम्रता होती है। जब शिष्य अपने ज्ञान, धन, पद या योग्यता का घमंड त्याग देता है, तभी वह गुरु की कृपा के पात्र बनता है। तीसरी भक्ति यही सिखाती है—सेवा का सौंदर्य तब खिलता है जब उसमें समर्पण हो, स्वार्थ नहीं।

🌷 गुरु सेवा क्यों आवश्यक है?
गुरु आत्मा को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले दीपक हैं। उनकी सेवा से शिष्य के भीतर की ग्रंथियां खुलती हैं, संदेह समाप्त होते हैं, और जीवन में एक दिव्यता प्रकट होती है। यह सेवा शारीरिक हो सकती है—जैसे उनके कार्यों में सहायता करना, या मानसिक—जैसे उनके उपदेशों का चिंतन करना। पर सबसे श्रेष्ठ सेवा वह है जिसमें शिष्य अपने ‘स्व’ को भूल जाए और बस गुरु के चरणों में रम जाए।

🌹 रामायण और गुरु भक्ति
प्रभु श्रीराम स्वयं कहते हैं कि गुरु सेवा करने वाला भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय है। भगवान राम के जीवन में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे गुरु रहे, जिनके निर्देशों का वे पूरे समर्पण से पालन करते थे। जब ईश्वर स्वयं गुरु को वंदन करता है, तो सामान्य मनुष्य के लिए गुरु का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

🌸 निष्कर्ष
तीसरी भक्ति – गुरु पद पंकज सेवा – एक साधक के जीवन में अनुशासन, विनम्रता और समर्पण की नींव रखती है। यह वह मार्ग है जहां अहंकार गलता है और ज्ञान का पुष्प खिलता है। नवधा भक्ति की इस कड़ी में अगर शिष्य सच्चे मन से गुरु चरणों की सेवा करता है, तो उसकी आत्मा धीरे-धीरे भगवद्प्राप्ति की ओर अग्रसर होती है।

“गुरु की सेवा वह दीपक है, जो आत्मा के अंधकार को दूर करता है। यही है तीसरी भक्ति का दिव्य रहस्य।”

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