✍️ Curated by the team of Boldvoices.in 28 मई 2025

गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह संकेत दिया है कि जब कोई साधक प्रेमपूर्वक भगवान की महिमा और उनकी लीला-कथाएं सत्संग में बैठकर सुनता है, तो समझो कि वह अब भक्ति की दूसरी सीढ़ी पर कदम रख चुका है, आध्यात्मिक रथ सरकने लगा है।
किन्तु यदि वह सत्संग में जाकर भी संतों के वचनों से, और प्रभु की कथा से प्रेम नहीं जोड़ पाता, तो जान लेना चाहिए कि उसका आध्यात्मिक रथ वहीं रुका हुआ है, वह गति को नहीं पा सका।
भक्तों का प्रेम सद्भावना, सत्संग और श्रीहरि से जुड़ा होता है, वे माया के मोह, संसार के छलावे में नहीं उलझते।
अतः यदि मन सच में प्रभु की ओर बढ़ चला है, तो सत्संग में बैठते ही हृदय में परमात्मा के लिए अनुराग प्रस्फुटित हो उठता है।
यह भाव ही भक्ति का दूसरा चरण है — जहाँ कथा केवल शब्द नहीं, साधना बन जाती है।
श्रीरामचरितमानस में श्रीराम जी ने नवधा भक्ति का वर्णन करते हुए दूसरी भक्ति को इस प्रकार कहा:
“दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।”
अर्थात, जो भक्त मेरे कथा प्रसंगों में प्रेम रखता है, वही मेरी दूसरी भक्ति को अपनाता है।
यह पंक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि उस आत्मा की पुकार है जो ईश्वर की लीला में लीन हो जाती है। यह भक्ति कथा-स्मरण की नहीं, कथा-रमण की साधना है — जहाँ श्रोता, दर्शक नहीं, स्वयं पात्र बन जाता है।
कथा: केवल सुनना नहीं, जीवंत होना
“रति” शब्द का अर्थ है प्रेम, अनुराग, और संपूर्ण समर्पण। इस भक्ति में साधक प्रभु श्रीराम की कथा में रमता है, उसे अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है। वह केवल सुनता नहीं, हर प्रसंग में जीता है —
सीता स्वयंवर में उसकी आंखों में उल्लास होता है, वनवास में पीड़ा बहती है, और भरत-मिलाप में उसकी आत्मा गद्गद हो उठती है।
यह भक्ति एक जीवंत अनुभव है, जहाँ कथा श्रोता के जीवन का आईना बन जाती है।
कथा में प्रेम क्यों?
क्योंकि कथा वही है, जो बार-बार सुनने पर भी नयी लगे, गहरायी से भरे, और अंतर्मन को छू जाए। श्रीराम की कथा ऐसी ही है — हर मोड़ पर नीति है, हर संवाद में भक्ति है, और हर प्रसंग में जीवन की शिक्षा छिपी है।
दूसरी भक्ति उस प्रेम को जन्म देती है, जिसमें कथा मात्र शब्द नहीं होती, बल्कि परमात्मा की उपस्थिति का साक्षात्कार बन जाती है।
आज की दुनिया में दूसरी भक्ति का स्थान
इस आधुनिक काल में, जहाँ मन भटकाव का शिकार है और जीवन में अधूरी दौड़ लगी है, वहाँ प्रभु श्रीराम की कथा एक ठहराव है। यह भक्ति हमें रूखी दिनचर्या से बाहर निकालकर आत्मा के मधुर जल में स्नान कराती है।
वह कथा जो युगों से गायी जा रही है, आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि श्रीराम कोई बीते युग के पात्र नहीं — वे सनातन प्रेम और मर्यादा के प्रतीक हैं।
दूसरी भक्ति इस सनातन प्रेम में श्रद्धा से भीगा संवाद है।
समापन में एक प्रार्थना
प्रभु श्रीराम की कथा के प्रति यह प्रेमभाव ही हमें उनके चरणों तक पहुंचा सकता है।
जो कथा में रम गया, वह संसार से निकल प्रभु के ह्रदय में प्रवेश कर गया।
नवधा भक्ति की यात्रा में अगले सोपान पर शीघ्र मिलेंगे।












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