✍️ Curated by the team of Boldvoices.in 📅 दिनांक: 27 मई, 2025


रामायण की पवित्र कथा में रावण के छोटे भाई विभीषण का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में दो तरह की छवियाँ बनती हैं। एक ओर वे श्रीराम के परम भक्त, सत्यवादी और नीति का पालन करने वाले पुरुष हैं, तो दूसरी ओर कई लोग उन्हें ‘घर का भेदी’ मानते हैं। पर क्या यह दूसरा दृष्टिकोण न्यायसंगत है?

चलिए, इस लेख में जानें कि विभीषण वास्तव में कौन थे — एक गद्दार या धर्म के लिए खड़ा एक नायक?


🌿 विभीषण का परिचय: नीति, भक्ति और ज्ञान के प्रतीक

विभीषण रावण और कुंभकर्ण के छोटे भाई थे, लंका के राजा पुलस्त्य ऋषि के वंशज।
राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद वे अहिंसा, भक्ति और संयम के मार्ग पर चले।
उनका जीवन संयम, संयंत्र और सत्संग से भरा था। उन्होंने बचपन से ही तपस्या की और भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखा।

ऐसा कहा जाता है कि उन्हें भगवान ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि वे अमृततुल्य आयु और सर्वज्ञता के धनी होंगे।
उनका स्वभाव शांत, संयमी और दूरदर्शी था — यही कारण है कि उन्होंने आने वाले संकटों को पहले ही पहचान लिया।


🕉️ रामभक्ति में पूर्ण समर्पण

जब विभीषण ने रावण को सीता माता को लौटाने की सलाह दी, तो यह केवल भाई का परामर्श नहीं था — यह धर्म की पुकार थी।
रावण ने जब बात न मानी, तो विभीषण ने श्रीराम की शरण ली।

🌸 श्रीराम ने उन्हें तुरंत शरण दी और कहा:

“जो भी मेरी शरण में आता है, वह चाहे शत्रु हो या मित्र, मैं उसे स्वीकार करता हूँ।”

यहीं से विभीषण और श्रीराम का अटूट संबंध शुरू हुआ। विभीषण ने न केवल भगवान राम को लंका की सामरिक जानकारी दी, बल्कि श्रीराम को एक मित्र, एक भक्त और एक सलाहकार के रूप में निरंतर सहयोग दिया।


⚔️ विभीषण के योगदान की झलकियाँ

  1. रावण-वध में भूमिका: उन्होंने श्रीराम को बताया कि रावण की नाभि में अमृत है, जिससे वह अजेय है। यह जानकारी निर्णायक सिद्ध हुई।
  2. लंका विजय के बाद: श्रीराम ने स्वयं विभीषण को लंका का राजा नियुक्त किया, यह प्रमाण है कि वे उन पर कितना विश्वास करते थे।
  3. रामराज्य का प्रतिनिधित्व: विभीषण का शासन भी रामराज्य की तरह धर्म, न्याय और सेवा पर आधारित था।

🪔 शास्त्रों में विभीषण की महिमा

  • वे रामनाम का जप हमेशा करते थे और जीवनभर रामभक्ति में लीन रहे।

📜 क्या विभीषण गद्दार थे? या समय से आगे सोचने वाले एक धर्मनायक?

जिसे लोग ‘घर का भेदी’ कहते हैं, वह वास्तव में घर का दीपक थे।
उसने जब अपने भाई को धर्म से भटकता देखा, तो आंखें मूँदकर साथ नहीं दिया।
विभीषण का निर्णय स्वार्थ से नहीं, बल्कि धर्मबुद्धि से प्रेरित था।

सच्ची भक्ति वही है, जो मूल्य और मर्यादा के सामने किसी संबंध की परवाह न करे।


निष्कर्ष: विभीषण — रामभक्ति का उज्ज्वल प्रतीक

विभीषण एक नायक थे, जिनकी भक्ति ने उन्हें अमर कर दिया।
वे भले ही लंका में जन्मे, पर मन से अयोध्या के भक्त थे।
उनकी जीवनकथा हमें सिखाती है कि—

  • धर्म की राह पर अकेला चलना पड़े, तो भी झिझकना नहीं चाहिए।
  • सत्य के लिए अपनों के विरोध में भी खड़ा होना कभी ‘गद्दारी’ नहीं होता।

“जिसने नीति के दीप जलाए,
जो रामनाम में सदा लीन रहा,
वही विभीषण कालजयी बना।”

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