27 मई 2025, ढाका Curated by the team of Boldvoices.in

बांग्लादेश में इस समय राजनीति के रंगमंच पर एक नया नाटक चल रहा है, जहां देश के अंतरिम नेता और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मोहम्मद यूनुस और देश की ताक़तवर सेना के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। सत्ता का यह संघर्ष अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है।
सेना और सरकार के रिश्ते में आई दरार
सेना मुख्यालय ने हाल ही में एक वक्तव्य जारी कर यह दावा किया कि सरकार और सैन्य बलों के बीच किसी भी तरह की खटास नहीं है। लेकिन हकीकत यह है कि सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने म्यांमार की सीमा पर एक मानवीय गलियारा बनाए जाने की योजना पर अपनी असहमति जताई है—एक योजना जिसे यूनुस सरकार ने रोहिंग्या शरणार्थियों की मदद के लिए तैयार किया था।
इसके अलावा, देश में आम चुनाव की तारीख को लेकर दोनों के बीच गंभीर मतभेद उभर आए हैं। सेना चाहती है कि चुनाव इसी वर्ष दिसंबर में हों, जबकि यूनुस प्रशासन इसे मार्च 2026 तक टालना चाहता है ताकि सुधारात्मक कदम पूरे किए जा सकें।
यूनुस के लिए बढ़ते संकट
देश के कई वर्गों—जैसे शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और अन्य सरकारी कर्मचारी—वेतन में वृद्धि और नौकरी की स्थिरता जैसे मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। इन प्रदर्शनों ने अंतरिम सरकार की स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। ऐसी चर्चाएँ भी गर्म हैं कि यूनुस पद छोड़ने का मन बना चुके हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगियों का कहना है कि वे अभी भी जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं।
राजनीतिक तूफ़ान या बदलाव की बयार?
यूनुस ने खुद देश की स्थिति को “एक अदृश्य युद्ध” जैसा बताया है, जहां हर दिशा से दबाव और विरोध की लहरें उठ रही हैं। विपक्ष ने इसे पड़ोसी देशों द्वारा देश पर प्रभाव जमाने की साज़िश बताया है। इन हालात में सेना और अंतरिम सरकार के रिश्तों में बढ़ती दूरी न केवल राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे रही है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक दिशा पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या मोहम्मद यूनुस और सेना के बीच कोई सहमति बनेगी, या फिर बांग्लादेश एक और अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ेगा?











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