Curated by the team of Boldvoices.in तिथि: 25 मई 2025


भक्ति की राह वह मधुर पथ है, जहाँ हृदय का कोना-कोना प्रेम और श्रद्धा से भर उठता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के मुख से नवधा भक्ति का वर्णन कराया है। उस पावन सूची में सबसे पहले आता है —

“प्रथम भगति संतन कर संगा।”
अर्थात: पहली भक्ति है संतों की संगति।

यह कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भक्ति मार्ग की नींव है — और इस नींव का नाम है सत्संग।

सत्संग में आकर ही जिज्ञासु गुरुकृपा से मुक्ति तक पहुँचता है क्यूंकि सत्संग से माया का असंग होता है , असंग से मोह का नाश , मोह के नाश से ज्ञान में दृढ़ता और ज्ञान में दृढ़ता ही जीवन मुक्ति है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने संव्य एक स्थान पर स्पष्ट किया है कि

“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।” –

यदि तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग के सभी सुखों को रखा जाये,और मुक्ति के सुख को रखा जाये; तब भी वह एक क्षण के सतसंग से मिलने बाले सुख के बराबर नहीं हो सकता।


सत्संग: जीवन की दिशा बदलने वाली शक्ति

‘सत्संग’ दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘सत’ यानी सत्य, और ‘संग’ यानी साथ। जब मनुष्य का साथ झूठे सुखों, माया, अहंकार और लोभ से हटकर संतों, सज्जनों और आध्यात्मिक विचारों की ओर होता है, तब वह जीवन के सत्य से साक्षात्कार करता है।

सत्संग से भक्त संसार में ऐसे रहते हैं जैसे जल में कमल। जल में रहकर कमल , जल में लिप्त नहीं होता और अपना प्रेम सूर्य से निभाता है। सूर्य के दर्शन हुए तो खिल गया , सूर्य ढल गया तो उदास हो गया। इसी प्रकार सत्संग में आकर संतो के, महात्माओं के दर्शन से भक्त माया में रहकर भी माया में लिप्त होने से बच जाता है और उसका ध्यान माया में लिप्त होने के स्थान पर प्रभु की भक्ति में लग जाता है।

सत्संग वह दीया है जो अज्ञान के अंधकार में ज्ञान का उजाला करता है।
सत्संग वह संगीत है जो मन को भटकाव से मोड़कर प्रभु की ओर ले जाता है।


प्रथम भक्ति में सत्संग का इतना महत्व क्यों है?

भगवान राम स्वयं कहते हैं कि यदि कोई उनके प्रिय भक्त बनना चाहे, तो उसे पहले संतों की संगति करनी चाहिए। ऐसा क्यों?

क्योंकि संत वह आईना हैं, जिसमें हम अपनी आत्मा का सच्चा स्वरूप देख पाते हैं।
उनकी वाणी शास्त्रों से भी अधिक प्रभावशाली होती है क्योंकि वह अनुभव से निकली होती है।
उनका जीवन चलता-फिरता उपदेश है — न कोई दिखावा, न कोई स्वार्थ।

सत्संग में बैठने से —

  • मन का विकार शुद्ध होता है।
  • वैराग्य और विवेक जागते हैं।
  • सच्चे सुख की पहचान होती है।
  • ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।

जैसे तुलसीदास जी कहते हैं:

“बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”


सत्संग: वर्तमान समय में अमृत समान

आज के समय में जब जीवन मशीन-सा हो चला है — दिनभर की भागदौड़, स्क्रीन का मोह, और आत्मीय संबंधों की कमी — ऐसे में सत्संग किसी तपते मरुस्थल में शीतल छाँव की तरह है।
यह केवल कथा सुनना नहीं, यह आत्मा को पोषित करने का अवसर है।


संतों की संगति से जीवन का रूपांतरण

इतिहास गवाह है कि सत्संग ने पापियों को संत बना दिया —

  • वाल्मीकि डाकू से महर्षि बन गए।
  • अजामिल जैसे पापी भी भगवान का नाम लेते-लेते मुक्त हो गए।

यह सब सत्संग की शक्ति से संभव हुआ।


भक्ति की पहली सीढ़ी — सत्संग

जो व्यक्ति अपने जीवन में सच्चा सुख, शांति और ईश्वर की निकटता चाहता है, उसके लिए पहला और सबसे आवश्यक कदम है — संतों की संगति करना।

सत्संग जीवन को साधारण से असाधारण, और सांसारिक से आध्यात्मिक बना देता है।
यही है प्रथम भक्ति का सार — संतों के साथ जुड़कर, प्रभु की ओर बढ़ना।


“जहाँ सत्संग है, वहाँ ईश्वर का वास है।
जहाँ संत हैं, वहाँ जीवन में प्रकाश है।”

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