Editorial By Gurdeep Singh, Senior Editor at Boldvoices.in दिनांक: 24 मई 2025

मध्य पूर्व की तपती हवाओं में एक दर्द सदीयों से तैर रहा है — कुर्दों का दर्द। तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान की सीमाओं में बँटा हुआ एक पूरा समुदाय — जिसकी कोई ज़मीन नहीं, लेकिन सपना है: कुर्दिस्तान की आज़ादी का। यह सिर्फ एक भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक इंसानी हक़ और न्याय की लड़ाई है। और अब सवाल यह है — क्या दुनिया उनकी पुकार सुनेगी? क्या भारत उनकी उम्मीद बन सकता है?
कुर्दों की कहानी: ज़मीन के बिना एक क़ौम
कुर्द जाति दुनिया की सबसे बड़ी ऐसी जातीय आबादी है जिसका कोई स्वतंत्र देश नहीं। लगभग 3 से 4 करोड़ कुर्द मुख्य रूप से तुर्की, सीरिया, इराक और ईरान में बसे हैं। इनके पास एक अलग भाषा, संस्कृति और पहचान है — फिर भी इन्हें राजनीतिक मान्यता नहीं दी गई।
तुर्की में कुर्दों पर अत्याचार: एक कड़वा सच
तुर्की में कुर्दों की स्थिति सबसे पीड़ादायक रही है। आधुनिक तुर्की राज्य ने कुर्दों की पहचान मिटाने के लिए हर संभव कोशिश की:
- भाषा पर रोक: कुर्द भाषा बोलने, पढ़ाने और प्रकाशित करने पर वर्षों तक प्रतिबंध रहा।
- संस्कृति का दमन: कुर्दों की पारंपरिक पोशाकें, लोकगीत और त्योहार तक “राजद्रोह” मान लिए गए।
- राजनीतिक उत्पीड़न: कुर्द नेताओं को झूठे मुकदमों में जेल में डाला गया। हज़ारों कार्यकर्ताओं को ग़ायब कर दिया गया या मार दिया गया।
- सैन्य हिंसा: दक्षिण-पूर्वी तुर्की में कुर्द बहुल इलाकों में सशस्त्र संघर्ष के नाम पर बस्तियाँ जला दी गईं। हज़ारों आम नागरिक मारे गए या बेघर हो गए।
1990 के दशक में, तुर्क सेना ने लगभग 3,000 कुर्द गांवों को तबाह कर दिया। PKK (Kurdistan Workers’ Party) के नाम पर की गई सैन्य कार्रवाइयों में निर्दोषों को भी आतंकवादी कहा गया।
2020 के बाद, तुर्की ने सीरिया में कुर्द लड़ाकों पर हमले किए और लाखों कुर्द परिवारों को फिर से विस्थापन झेलना पड़ा। तुर्की की सरकार बार-बार कुर्द मुद्दों को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा’ बता कर दबाने की कोशिश करती है।
दुनिया क्या कर सकती है?
- मानवाधिकार निगरानी: संयुक्त राष्ट्र को तुर्की और अन्य देशों में कुर्दों के हालात पर विशेष रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय दबाव: तुर्की जैसे देशों पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाना चाहिए ताकि वे कुर्दों के अधिकारों को मान्यता दें।
- स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह: दुनिया को कुर्दों के आत्मनिर्णय की माँग का समर्थन करना चाहिए।

भारत क्या कर सकता है?
भारत, जिसकी आत्मा में गाँधी और विवेकानंद की करुणा है, वह दुनिया को दिखा सकता है कि नैतिक नेतृत्व क्या होता है:
- कुर्दों के अधिकारों का समर्थन: भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुर्दों की आवाज़ को उठाना चाहिए।
- शिक्षा और पुनर्निर्माण में मदद: भारत कुर्द छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति दे सकता है और कुर्द क्षेत्रों में स्वास्थ्य व शिक्षा का सहयोग दे सकता है।
- सांस्कृतिक संबंध: भारत और कुर्दिस्तान के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से आपसी सम्मान और समर्थन मज़बूत हो सकता है।
भारत क्यों आगे बढ़े?
भारत स्वयं एक उपनिवेश से आज़ाद हुआ है। हमें गुलामी का दर्द मालूम है। अगर हम वास्तव में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास रखते हैं, तो कुर्दों की पीड़ा को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। यह एक ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है — और एक नैतिक अवसर भी।
कुर्दिस्तान आज भी नक्शों में नहीं, लेकिन दिलों में बसा है।
वहाँ की पहाड़ियों से हर शाम एक पुकार उठती है —
“हमें जीने दो अपने नाम से, अपनी ज़मीन पर।”
दुनिया अगर मानवता का नाम लेती है, तो उसे कुर्दों के साथ खड़ा होना ही होगा।
और भारत — जिसे दुनियाभर में ‘सत्य और अहिंसा’ का प्रतीक माना जाता है — को अब यह दिखाना होगा कि वह सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी आवाज़ उठाता है।
“जब तक एक भी कुर्द माँ अपने बेटे की लाश को झुलसा हुआ देखेगी,
तब तक मानवता अधूरी रहेगी।
आओ, कुर्दिस्तान को उसका हक़ दिलाएँ —
जहाँ मिट्टी भी कुर्दी में गाती हो आज़ादी का गीत।”











Leave a comment