ढाका, 23 मई – बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार के प्रमुख प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के पद पर बने रहने को लेकर देश के सियासी गलियारों में तीखी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक तरफ सेना प्रमुख जनरल ज़मान लगातार चुनाव में देरी की मांग कर रहे हैं, दूसरी ओर प्रो. यूनुस अपने पद पर अडिग हैं – जिससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब उनका उद्देश्य निष्पक्ष चुनाव कराना है या सत्ता के केंद्र में टिके रहना?

सरकार का रुख और बढ़ते मतभेद

सूचना मंत्री हसनुल हक इनू ने हाल ही में कहा,
“प्रोफेसर यूनुस सत्ता के भूखे नहीं हैं।”
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर उन्हें सत्ता की कोई लालसा नहीं है, तो चुनाव में देरी को लेकर सेना प्रमुख के साथ बने टकराव को इतना लंबा क्यों खींचा जा रहा है?

क्या वास्तव में उनका लक्ष्य सिर्फ लोकतंत्र को बचाना है, या वे अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने की रणनीति बना रहे हैं?

जनता की नजरों में संदेह

हाल ही में कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया कि प्रो. यूनुस क्यों बार-बार सेना के सुझावों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जबकि देश के कई हिस्सों में तनाव और सुरक्षा की चिंता बनी हुई है।

एक स्थानीय अखबार ने लिखा – क्या नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अब सत्ता का स्वाद छोड़ नहीं पा रहे?”

विपक्षी नेताओं का आरोप

कुछ विपक्षी दलों ने यह भी आरोप लगाए हैं कि प्रो. यूनुस की सरकार ‘न्यायप्रिय लोकतंत्र’ की आड़ में एकतरफा फैसले ले रही है, और सेना की आशंकाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह टकराव बांग्लादेश की स्थिरता के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है।

बांग्लादेश में फिलहाल असली सवाल यह नहीं है कि चुनाव कब होंगे — बल्कि यह है कि राजनीतिक जिम्मेदारी और सत्ता के बीच सीमाएं कितनी स्पष्ट हैं? और सबसे बड़ा सवाल ये – क्या प्रो. यूनुस अब भी उसी निष्कलंक छवि में हैं, जिसके लिए कभी उन्हें नोबेल मिला था?


Leave a comment

Trending