दिनांक: 20 मई 2025 By Gurdeep Singh, Senior Editor at Boldvoices.in


इस्लामाबाद —
पाकिस्तान में सत्ता का खेल शतरंज नहीं, साँप-सीढ़ी है — जहाँ कल तक जो सर्वोच्च पद पर था, वह अगले दिन जेल की कालकोठरी में पाया जाता है। आज जब जनरल आसीम मुनीर को “फील्ड मार्शल” की उपाधि से नवाज़ा गया है, तो असल सवाल यह नहीं कि उन्हें क्या मिला — बल्कि यह है कि अब उनके साथ क्या होगा?


फील्ड मार्शल का पद: अगला कदम जेल?

इतिहास गवाह है — पाकिस्तान में जो भी सेना प्रमुख सत्ता के बहुत पास चला गया, अंत में या तो नज़रबंद हुआ, जेल भेजा गया, या निर्वासन में भेज दिया गया।

  • अय्यूब ख़ान: सत्ता से हटने के बाद तिरस्कार और तन्हाई में मृत्यु।
  • याह्या ख़ान: युद्ध हारने के बाद घर में नज़रबंद।
  • परवेज़ मुशर्रफ़: पहले तानाशाह, फिर मुकदमेबाज़, और अंत में विदेश में मृत्यु।

अब सवाल है — क्या जनरल (अब फील्ड मार्शल) आसीम मुनीर भी इसी परंपरा का नया अध्याय बनेंगे?


“इज्ज़त से साइडलाइन, फिर धीरे-धीरे गायब”

फील्ड मार्शल का तमगा पाकिस्तान में असल में कोई अधिकार नहीं देता — बस एक सजावटी ओहदा है, जिसे देकर सत्ता यह कहती है:
“अब आप कुछ मत बोलिए, बस शोभा बढ़ाइए।”
लेकिन इतिहास बताता है कि शोभा भी अधिक दिन नहीं चलती — जब-जब पूर्व सेनाध्यक्षों ने बोलने की कोशिश की, उनके लिए दो रास्ते खुले:

  1. जेल की सलाखें, या
  2. विदेशी विमान की टिकट।

आसीम मुनीर की स्थिति: असहज शांति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आसीम मुनीर को इस पद पर बैठाकर

  1. उन्हें सेना और राजनीति से काट दिया गया है,
  2. और अब अगर उन्होंने हस्तक्षेप किया, तो
    • राजद्रोह,
    • साजिश,
    • या करप्शन जैसे मामलों में फंसाना कोई नई बात नहीं होगी।

क्या आसीम मुनीर को फांसी हो सकती है?

कानूनन फांसी का सवाल तब उठता है जब कोई सैन्य बगावत, संविधान का उल्लंघन, या राजनीतिक साजिश सिद्ध हो।
पर पाकिस्तान में कानून से ज़्यादा महत्त्व रखता है — माहौल। और अगर सत्ता को किसी को खत्म करना हो, तो आरोप ढूँढ़ना कभी मुश्किल नहीं होता।


निष्कर्ष: सत्ता की गोदी से जेल की कोठरी तक

आज भले ही आसीम मुनीर को फील्ड मार्शल कहकर सम्मान दिया गया हो, लेकिन पाकिस्तान की परंपरा यही कहती है:
“जो वर्दी में शहंशाह बना, वही कल आम क़ैदी बनता है।”

अब देखना यह है कि

  • क्या आसीम मुनीर चुप रहेंगे?
  • क्या उन्हें विदेश भेज दिया जाएगा?
  • या क्या वह परवेज़ मुशर्रफ़ की तरह “फ़ौजी गौरव से अदालती अपमान” की ओर बढ़ेंगे?

सवाल अभी ज़िंदा है। जवाब — शायद जल्द ही एतिहासिक हो जाएगा।


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