पाकिस्तान का सबसे ऊँचा ओहदा और सबसे निचली हैसियत
दिनांक: 20 मई 2025, By KSR, Editor at Boldvoices.in

इस्लामाबाद —
बधाई हो! पाकिस्तान ने एक और शानदार प्रतीकात्मक पद को पुनर्जीवित किया है — जनरल आसीम मुनीर को बनाया गया है फील्ड मार्शल। जी हाँ, वही ओहदा जिसे सुनते ही लगता है जैसे युद्ध के मैदान में झंडे गाड़ दिए गए हों, लेकिन हकीकत में यह ऐसा तमगा है जो सेनाध्यक्षों को रिटायर किए बिना साइडलाइन करने का सबसे सुसंस्कृत तरीका बन चुका है।
फील्ड मार्शल: पद या पोस्टर?
पाकिस्तान में फील्ड मार्शल का पद वैसा ही है जैसे पुराने सरकारी दफ्तरों में पड़ी फाइलें — कोई खोलता नहीं, लेकिन दिखता खूब है।
ना कोई संवैधानिक शक्ति, ना कोई कमान, ना कोई भूमिका — सिर्फ़ एक शोभा की वस्तु जिसे देखकर सत्ताधारी हँसते हैं और जनरल साहब धीरे से खाँसते हैं।
सजा या सजावट?
कुछ लोगों का मानना है कि आसीम मुनीर को सम्मानित किया गया है। मगर जानकार मुस्कुरा कर कहते हैं — “भैया, यह प्रमोशन नहीं, पोस्टिंग है — रिज़र्व बेंच पर!”
दरअसल, यह वो समय है जब सत्ता को यह बताना होता है कि “आपको बाहर नहीं कर रहे, बस ऊपर भेज रहे हैं… इतना ऊपर कि नीचे की कोई आवाज़ वहाँ नहीं पहुँचती।”

पाकिस्तानी सेना: पहले सत्ता, अब सजावट
कभी जो सेना पाकिस्तान की राजनीति, विदेश नीति और यहाँ तक कि राशन कार्ड नीति तक तय करती थी, आज वही सेना अपने फील्ड मार्शलों को गुमनाम पदों पर बैठाकर संदेश दे रही है — “अब आपकी जरूरत नहीं, लेकिन वर्दी में हम आपकी फोटो खिंचवा लेंगे।”
लोकतंत्र की लाठी, फील्ड मार्शल की छाया
यह भी दिलचस्प है कि जब-जब पाकिस्तान में कोई फील्ड मार्शल बनाया गया है, लोकतंत्र कुछ ज़्यादा ही “लोकप्रिय” हो जाता है। जनरल अय्यूब खान के बाद अब शायद यही दूसरा मौका है जब फील्ड मार्शल को बनाकर उसे रिटायरमेंट की पालकी में बैठा दिया गया है — बस वह पालकी थोड़ी सुनहरी है, और उस पर लिखा है:
“No Powers Attached. Only Prestige. Batteries Not Included.”
तमगे से तन्हाई तक
पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों में यह नया चलन है — जो जनरल ज़्यादा बोलने लगे, उन्हें ऊँचा ओहदा देकर इतनी ऊँचाई पर भेज दो कि वे जमीन की राजनीति में लौट ही न सकें।
फील्ड मार्शल आसीम मुनीर अब इतिहास के उस कोने में हैं जहाँ नाम तो रहेगा, पर निर्णय नहीं।
“वर्दी तो है, मगर बटन दबाने की कोई मशीन नहीं।”











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