एक तार्किक और सकारात्मक दृष्टिकोण से विश्लेषण

Date : 16/05/2025, Writer : KSR, Editor at Boldvoices


“मैं भगवान को नहीं मानता…”
यह वाक्य आज के युग में अनेक लोगों की सोच बन चुका है — और यह सोच स्वाभाविक है, जब हम दुनिया में असमानता, अन्याय, पीड़ा और संघर्ष को देख रहे होते हैं। यह प्रश्न बार-बार उठता है: यदि भगवान है, तो वह भेदभाव क्यों करता है? कोई अमीर क्यों, कोई गरीब क्यों? किसी को स्वास्थ्य, किसी को बीमारी क्यों?

परंतु यदि हम थोड़ी देर के लिए अपनी भावनाओं को विराम दें और तर्क, अनुभव, और प्रकृति की भाषा को सुनें, तो हमें एक अलग, गहराई से परिपूर्ण उत्तर मिलने लगता है — एक ऐसा उत्तर जो शायद विश्वास से नहीं, पर बुद्धि से निकट आता है।


1. प्रकृति की भाषा: क्या सूर्य भेदभाव करता है?

क्या सूर्य यह देखता है कि कौन अच्छा है, कौन बुरा?
वह तो सब पर एक जैसा प्रकाश डालता है — संत पर भी, पापी पर भी।
क्या वायु यह देखती है कि कौन उसका पात्र है?
वह तो सबको साँस लेने देती है — अमीर हो या गरीब, भक्त हो या नास्तिक।

भगवान को यदि हम प्रकृति का आदिस्रोत मानें, तो यह स्पष्ट होता है कि भगवान में कोई पक्षपात नहीं।
जो नियम सब पर समान रूप से लागू हों — वही ईश्वर की सच्ची झलक हैं।


2. कर्म का सिद्धांत — न्याय का गूढ़ विज्ञान

हिंदू दर्शन में भगवान को “कर्मफलदाता” कहा गया है — अर्थात वह केवल हमारे कर्मों का फल देता है, न कि भावनाओं या जाति के आधार पर भेद करता है।

यदि कोई विद्यार्थी मेहनत न करे और परीक्षा में असफल हो जाए, तो क्या वह शिक्षक को अन्यायी कहेगा? नहीं।
ठीक वैसे ही, भगवान ने हमें स्वतंत्रता दी है — सोचने की, करने की, और चुनने की।
भेदभाव तब होता यदि सभी को एक जैसे कर्मों पर अलग-अलग फल मिलते — लेकिन संसार में कर्म और फल का संबंध बहुत गहराई से जुड़ा है। एक ही कर्म को अलग-अलग लोग अलग तरीके से करते हैं , इसलिए फल भी अलग-अलग ही मिलते हैं। यदि एक व्यक्ति गर्मी के मौसम में चाय बेचे और दूसरा व्यक्ति सर्दी के मौसम में चाय बेचे तो निश्चित ही सर्दी में चाय बेचने वाला अधिक पैसा कमाएगा , अब अगर गर्मी में चाय बेचने वाला कहे की मैंने भी चाय ही बेची थी , मुझे तो कर्म का वैसा फल नहीं मिला जैसा दूसरे व्यक्ति को मिला और यह कहने लगे की भगवन अन्याय करता है तो यह मूर्खता होगी। कर्म को देश , काल और परिस्थिति के अनुसार करने पर भी बेहतर परिणाम मिलते हैं।


3. पीड़ा और असमानता: दंड या दिशा?

जीवन में जो कठिनाइयाँ आती हैं, वे दंड नहीं, बल्कि दिशा देने के साधन भी हो सकते हैं।
जैसे एक माँ अपने बच्चे को गर्म लोहे से दूर रहने के लिए चेतावनी देती है, कभी-कभी तमाचा भी लगा देती है ताकि बच्चा जल ना जाए — यह माँ का दंड नहीं, बल्कि बच्चे के भले के लिए और उसे सही शिक्षा देने के लिए है।

डॉक्टर भी हमें कड़वी दवा हमारे भले के लिए देता है , हमारी बीमारी को , कष्ट को दूर करने लिए देता है और अगर हम ये कहें की डॉक्टर ने कड़वी दवा दी है तो डॉक्टर पीड़ा दे रहा है तो यह मूर्खता ही होगी।

कभी-कभी भगवान हमें मजबूत करने के लिए जीवन में कुछ कठिन राहें देता है — ताकि हम सीखें, बढ़ें, और भीतर से परिपक्व बनें।
दुख में ईश्वर छिपा नहीं होता, वह तो उसी दुख के माध्यम से हमारे पास आता है।


4. भौतिक सुख नहीं, आत्मिक विकास है ईश्वर का लक्ष्य

हमें लगता है कि भगवान केवल तब अच्छा है जब वह हमें धन, सुख, स्वास्थ्य दे —
पर क्या वही सच्चा कल्याण है?
अगर एक बच्चा केवल मिठाई माँगे, और माँ उसे पौष्टिक भोजन दे, तो क्या माँ अन्याय कर रही है?

ईश्वर का उद्देश्य आत्मा का विकास है, न कि केवल शरीर का सुख।
भगवान हमें वह नहीं देता जो हम चाहते हैं, बल्कि वह देता है जो हमें वास्तव में चाहिए — हमारी आत्मा के उत्थान के लिए।


5. ईश्वर सर्वजनों के हैं — किसी विशेष समूह के नहीं

इतिहास में जो धर्मों के नाम पर भेदभाव हुए, वे ईश्वर की रचना नहीं थे — वे मानव की सीमित सोच का परिणाम थे।
भगवान को न किसी मंदिर की ज़रूरत है, न किसी विशेष भाषा, न जाति, न संप्रदाय।

“ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।। “

हे ईश्वर! हमको असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता के भाव की ओर ले चलो।

यह वैदिक प्रार्थना किसी धर्मविशेष के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए है।

ईश्वर वह है जो सबके भीतर है — वह धड़कन में है, साँस में है, और चेतना में है।


6. ईश्वर को मानो या न मानो — वह तुम्हारे साथ है

आप भगवान को न मानें — यह भी भगवान की ही दी गई स्वतंत्रता है।
भगवान आपको आपके तर्क, विवेक और अनुभवों के साथ विकसित होते देखने में रुचि रखता है।
आपने कभी माँ से मुंह मोड़ा हो, पर माँ ने आपको देखना बंद किया हो ऐसा हुआ है क्या?

भगवान की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह नास्तिक को भी उतनी ही धूप देता है जितनी आस्तिक को।
भगवान प्रेम करता है — बिना शर्त।


भगवान कोई सिंहासन पर बैठा शासक नहीं, जो इनाम और सज़ा बाँटता हो।
परमात्मा एक मौन शक्ति है, एक गूढ़ नियम, एक अंतर्निहित व्यवस्था — जो इस ब्रह्मांड को संतुलन से चलाती है।
परमात्मा भेदभाव नहीं करता, क्योंकि वह सब में समाहित है।

“जो सब में है, वह किसी से भेद कैसे कर सकता है?”

आप भगवान को न मानें — यह आपकी यात्रा का हिस्सा है।
पर यदि आप कभी जीवन की उस गहराई में उतरें जहाँ तर्क थम जाते हैं और अनुभूति बोलती है,
तो आप पाएँगे कि एक करुणामय सत्ता सदा आपके साथ रही — चुपचाप परंतु समर्पित।


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