Date : 14/05/2025 Curated by the team of Boldvoices

🌿 परिचय (Introduction)
संथारा (या सल्लेखना) जैन धर्म की एक विशेष और आध्यात्मिक परंपरा है, जिसमें कोई व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में स्वेच्छा से अन्न-जल त्यागकर मृत्यु को अपनाता है। यह आत्मशुद्धि और वैराग्य की चरम अभिव्यक्ति मानी जाती है।
📜 संथारा का अर्थ (Meaning of Santhara)
संथारा शब्द का अर्थ होता है – “धैर्यपूर्वक मृत्यु को स्वीकार करना”।
यह कोई आत्महत्या नहीं, बल्कि ध्यान, संयम और तप का एक अत्यंत कठिन मार्ग है, जिसमें व्यक्ति काया के प्रति मोह छोड़कर आत्मा की ओर लौटता है।
🕊️ संथारा कब और क्यों किया जाता है?
- जब कोई व्यक्ति असाध्य रोग, अत्यधिक वृद्धावस्था या शरीर की सेवाशक्ति समाप्त होने की अवस्था में पहुँचता है।
- जब वह समझ लेता है कि अब जीवन में कोई कर्तव्य शेष नहीं है।
- तब वह गुरु और परिवार की सहमति से संथारा का संकल्प लेता है।
🔍 संथारा की प्रक्रिया (How It Is Practiced)
- मानसिक और आत्मिक तैयारी की जाती है।
- व्यक्ति सभी इच्छाएँ त्याग देता है — भोजन, जल, सांसारिक सुख।
- वह ध्यान, प्रार्थना, साधना और स्वाध्याय में लीन रहता है।
- धीरे-धीरे शरीर क्षीण होता है, और अंततः शांति से मृत्यु होती है।
🧘♀️ धार्मिक महत्व (Spiritual Significance)
- यह पुण्य और मोक्ष का मार्ग माना जाता है।
- संथारा के द्वारा कर्मों का क्षय होता है।
- आत्मा शुद्ध होकर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सकती है।
⚖️ विवाद और कानूनी स्थिति (Controversy & Legal View)
- कुछ वर्षों पूर्व इसे आत्महत्या बताकर अदालत में चुनौती दी गई थी।
- लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्थगित कर दिया, और कहा गया कि: “संथारा आत्महत्या नहीं, बल्कि आस्था और धर्म की अभिव्यक्ति है।”
🙏 निष्कर्ष (Conclusion)
संथारा केवल एक प्रथा नहीं, एक गहरी साधना है। यह जैन धर्म के अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मदर्शन के मूल सिद्धांतों की जीती-जागती मिसाल है। जब जीवन में कुछ भी शेष न बचे, तब मृत्यु को भी एक तपस्या की तरह स्वीकार करना — यही है संथारा की सच्ची भावना।











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