Date : 14/05/2025 Editorial By Gurdeep Singh, Senior Editor at Boldvoices


बलोचिस्तान की धरती पर सूरज उगता है, मगर उजाला नहीं फैलता। यहाँ हर सुबह किसी की चीख़ के साथ होती है और हर रात किसी घर से कोई जबरन उठा लिया जाता है। यह बलोचिस्तान नहीं, एक खुली जेल है — और इस जेल का क्रूर जेलर है: पाकिस्तान की सेना।


जिन्हें सेना उठाती है, वे लौटते नहीं

बलोचिस्तान में जबरन गुमशुदगियाँ कोई अनजाना अपराध नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना की एक घोषित रणनीति बन चुकी है। हर गाँव, हर कस्बे में लोग रात के अंधेरे में फौजी वाहनों की आवाज़ पहचानते हैं — क्योंकि वे जानते हैं कि कोई अब वापस नहीं आएगा।

हजारों बलोच नौजवान — शिक्षक, छात्र, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता — केवल इसलिए उठा लिए गए क्योंकि वे बलोचिस्तान की पहचान और हक़ की बात करते थे। न कोई वारंट, न कोई मुकदमा। सेना उन्हें घसीटकर ले जाती है — और फिर वे इतिहास से मिटा दिए जाते हैं।


Dr. Mahrang Baloch

डॉ. माहरांग बलोच की गिरफ़्तारी

डॉ. माहरांग बलोच, एक साहसी मानवाधिकार कार्यकर्ता और शांतिपूर्ण आंदोलन की प्रतीक, को हाल ही में पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किया गया — केवल इसलिए कि उन्होंने बलोचिस्तान में जबरन गुमशुदगियों और सेना की बर्बरता के खिलाफ आवाज़ उठाई। उनकी गिरफ्तारी, न केवल एक व्यक्ति की आज़ादी का हनन है, बल्कि यह दर्शाती है कि पाकिस्तान में सच बोलना अब एक अपराध बन चुका है। डॉ. माहरांग की शांतिपूर्ण अपीलों को डर और दमन से कुचलने की यह कोशिश, बलोच जनता की पीड़ा और राज्य के दमनकारी रवैये को और उजागर करती है।

पाकिस्तानी सेना के हाथों मारे गए सपने

जो कभी लौटते हैं, वे लाश बनकर लौटते हैं। और कई बार वो भी नहीं। फर्ज़ी मुठभेड़ों में उन्हें मार दिया जाता है, और फिर बयान आता है — “आतंकवादी मारा गया।”
पाकिस्तानी सेना अपने ही नागरिकों के साथ इस तरह पेश आती है जैसे वह किसी दुश्मन देश में कार्यवाही कर रही हो।

हर बलोच माँ का दिल जानता है — उसके बेटे को पाकिस्तानी सेना ने मारा है। यह वह सेना है जो देश की रक्षा की शपथ लेती है, लेकिन बलोचिस्तान में वही सेना बलात्कार, हत्या और अपहरण की कहानियाँ लिख रही है।


सेना की बूटों के नीचे दबी इंसानियत

बलोचिस्तान में सेना की उपस्थिति सुरक्षा नहीं, आतंक का प्रतीक बन चुकी है। गाँव के गाँव खाली करवा दिए गए हैं, लोगों की जमीनें हथिया ली गई हैं, और जो विरोध करता है, वह “गायब” हो जाता है।
सेना ने न केवल लोगों के शरीरों को रौंदा है, बल्कि उनकी आत्मा, उनकी संस्कृति, और उनकी आवाज़ को भी कुचलने का पाप किया है।


माताएँ गवाह हैं इस बर्बरता की

इस्लामाबाद में वर्षों से बैठी वे माताएँ, जिनके बेटों को सेना ने अगवा किया, आज तक जवाब चाहती हैं। मगर पाकिस्तान की न्याय प्रणाली भी उसी सेना की गुलाम है।
उनकी चीख़ों पर अदालतें चुप हैं, संसद अंधी है, और मीडिया बिक चुका है। एक देश, जहाँ सेना खुद को देश समझती है — वहाँ नागरिकों की चीख़ें गूंजती नहीं, ग़ायब कर दी जाती हैं।


बलोचिस्तान में लापता लोगों की संख्या को लेकर आँकड़े

बलोचिस्तान में लापता लोगों की संख्या को लेकर आँकड़े अलग-अलग हैं और यह विषय अत्यंत संवेदनशील एवं विवादित बना हुआ है।

वॉइस फ़ॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स (VBMP) नामक एक प्रमुख संगठन के अनुसार, सन् 2001 से 2017 के बीच लगभग 5,228 बलोच लोगों के जबरन गायब होने की रिपोर्ट दर्ज की गई है। ये वे लोग हैं जिन्हें पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाए जाने का आरोप है, मगर उनके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

एक और रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से लेकर अब तक पाकिस्तान में कुल 10,078 लोग जबरन गुमशुदगी का शिकार हुए, जिनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा बलोचिस्तान से है।

हालाँकि, बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्र संगठनों का दावा है कि असली संख्या इससे कहीं ज़्यादा है — कई हजार नहीं बल्कि “दसियों हजार” बलोच नागरिक पिछले दो दशकों में ग़ायब किए जा चुके हैं।

सरकारी आंकड़ों की कमी, पारदर्शिता का अभाव और सेना के दमन के डर से बहुत से परिवार सामने भी नहीं आ पाते। यही कारण है कि बलोचिस्तान की गुमशुदगियाँ केवल संख्या नहीं — एक गहरा और अनकहा ज़ख़्म हैं।


बलोचिस्तान: एक उपनिवेश, एक युद्धभूमि

बलोचिस्तान के साथ पाकिस्तान की सेना जो कर रही है, वह शुद्ध उपनिवेशवादी दमन है। न यह लोकतंत्र है, न यह सुरक्षा। यह एक सुनियोजित युद्ध है — बलोच लोगों के खिलाफ़।
और इस युद्ध की सबसे खौफनाक बात यह है कि इसका कोई मोर्चा नहीं, केवल लाशों की कतारें हैं, और मातम की दास्तानें।


जब सेना ही अपराधी हो, तो इंसाफ़ कौन देगा?

जब एक देश की सेना ही अपने नागरिकों की क़ातिल बन जाए, जब न्याय व्यवस्था उसके बूट तले रौंदी जाए — तब बलोचिस्तान की माताओं के आँसू ही इतिहास लिखेंगे।
ये आँसू कहेंगे — हमारे बच्चों को पाकिस्तान की सेना ने मारा। हमारी संस्कृति को उनकी बंदूकों ने रौंदा। और हमारे भविष्य को उनके टैंकों ने कुचला।


“पाकिस्तानी सेना केवल एक सैन्य संस्था नहीं — बलोचिस्तान के लिए वह आतंक की सबसे बड़ी मशीन है।”


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