दिनांक: 4 मई 2025, लेखक: Team of Boldvoices

भारत में जाति जनगणना एक लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जाति आधारित जनगणना का निर्णय लिया गया, जिसे “ऐतिहासिक कदम” कहा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह निर्णय सरकार की स्वतः पहल थी या इसके पीछे विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की निरंतर मांग और रणनीतिक दबाव ने अहम भूमिका निभाई? यहाँ हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर राहुल गांधी को जाति जनगणना के लिए श्रेय क्यों मिलना चाहिए।
1. जाति जनगणना की लंबे समय से मांग
राहुल गांधी ने 2019 से ही जाति जनगणना की मांग को खुलकर उठाया है। उन्होंने संसद से लेकर चुनावी रैलियों तक इस मुद्दे को बार-बार उठाया और कहा कि भारत में पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज को उनका “हक़“ तब तक नहीं मिल सकता जब तक उनकी सही आबादी का पता न चले।
उनका प्रसिद्ध नारा “जितनी आबादी, उतना हक़” देशभर में गूंजा और कई सामाजिक संगठनों ने इसे समर्थन भी दिया। यह सिर्फ एक चुनावी जुमला नहीं था, बल्कि एक सामाजिक न्याय की दृष्टि से उठाया गया ठोस कदम था।
2. राज्य स्तरीय पहल का नेतृत्व
राहुल गांधी के प्रभाव में कांग्रेस शासित राज्यों – खासकर कर्नाटक, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ – ने स्वतंत्र रूप से जाति सर्वेक्षण शुरू कर दिए। कर्नाटक सरकार ने 2023 में ही अपनी जाति आधारित सर्वे रिपोर्ट तैयार की और राहुल गांधी ने उस मॉडल को पूरे देश में लागू करने की बात कही।
इन प्रयासों से यह संदेश गया कि अगर केंद्र सरकार तैयार नहीं है, तो कांग्रेस अपने स्तर पर समाज को आंकड़ों के आधार पर न्याय देने को तैयार है। इससे केंद्र सरकार पर जनता और विपक्ष का दबाव और भी बढ़ गया।
3. राजनीतिक दबाव और नैरेटिव तैयार करना
राहुल गांधी ने जाति जनगणना को केवल तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान उन्होंने हर राज्य में जातीय असमानता, भेदभाव और आरक्षण की विसंगतियों का मुद्दा उठाया।
उन्होंने कहा:
“अगर हमें समाज में बराबरी लानी है, तो हमें जानना होगा कि किसकी संख्या कितनी है और उन्हें कितना हिस्सा मिल रहा है।”
इस तरह राहुल गांधी ने इस विषय को आम जनमानस का मुद्दा बना दिया और एक नैरेटिव खड़ा किया जिसे नकारना भाजपा सरकार के लिए मुश्किल होता गया।

4. केंद्र सरकार की उलझन और पलटी
पहले भाजपा सरकार जाति जनगणना के खिलाफ थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसे “अर्बन नक्सल मानसिकता” बता चुके थे। कई मंत्री इसे विभाजनकारी राजनीति कह कर खारिज करते रहे। लेकिन विपक्ष, विशेष रूप से राहुल गांधी की लगातार अपील, कांग्रेस के घोषणापत्र, और राज्यों में हुई जाति गणनाओं ने सरकार को नीतिगत यू-टर्न लेने के लिए मजबूर कर दिया।
जब केंद्र ने अंततः जनगणना में जातिगत आंकड़े शामिल करने की घोषणा की, तो कांग्रेस ने इसे अपनी राजनीतिक जीत बताया। मल्लिकार्जुन खड़गे ने स्पष्ट कहा,
“यह राहुल गांधी के निरंतर दबाव और दृढ़ता का ही परिणाम है कि आज सरकार को झुकना पड़ा।”
निष्कर्ष
जाति जनगणना के फैसले का श्रेय अकेले सरकार को नहीं, बल्कि उस राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन को भी देना चाहिए जो राहुल गांधी ने खड़ा किया। उन्होंने न केवल मांग की, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर, राज्यों में नीतिगत फैसलों के जरिए और जनता से संवाद के ज़रिए इसे एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बना दिया।
इसलिए कहा जा सकता है कि जाति जनगणना को लेकर जो भी निर्णय हुआ है, उसका वास्तविक श्रेय राहुल गांधी को मिलना चाहिए, जिन्होंने इसे केवल चुनावी वादे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एक जनआंदोलन बना दिया।











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