तारीख: 4 मई 2025, लेखक: Team of Boldvoices


मुख्य बिंदु:

  • आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती।
  • इसलिए जो दलित हिंदू ईसाई धर्म में धर्मांतरण कर चुके हैं, वे अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) एक्ट के तहत संरक्षण या लाभ नहीं ले सकते।
  • कोर्ट ने कहा कि धर्म बदलने के बाद जाति से जुड़ी कानूनी सुरक्षा स्वतः खत्म हो जाती है।

कोर्ट में मामला क्या था?

एक व्यक्ति पर SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था। आरोपी ने दलील दी कि पीड़ित व्यक्ति अब ईसाई धर्म में है, इसलिए वह SC/ST एक्ट के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार कर लिया और कहा कि:

“जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म को अपनाता है, तो वह संविधान द्वारा अनुसूचित जाति के लिए दिए गए विशेष अधिकारों का हकदार नहीं रहता।”


कोर्ट का तर्क क्या था?

  1. ईसाई धर्म में जातिवाद की अवधारणा नहीं होती।
    ईसाई धर्म समानता और भाईचारे पर आधारित है, इसलिए वहां जाति आधारित भेदभाव का कोई आधार नहीं है।
  2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार, अनुसूचित जातियों की सूची में केवल वे लोग आते हैं जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से संबंधित हों।
  3. धर्मांतरण के बाद जाति का कानूनी महत्व समाप्त हो जाता है।
    भले ही सामाजिक रूप से कोई व्यक्ति खुद को उसी जाति का माने, लेकिन कानून में वह अब अनुसूचित जाति के तहत नहीं आता।

इसका असर क्या होगा?

  • अब आंध्र प्रदेश में यदि कोई दलित व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत कानूनी संरक्षण नहीं ले पाएगा।
  • यह फैसला उन मामलों में विशेष रूप से लागू होगा, जहाँ SC/ST एक्ट के तहत शिकायत की गई हो, जैसे – जातिसूचक गाली, भेदभाव, या अत्याचार।

केंद्र सरकार की नीति क्या कहती है?

भारतीय संविधान की अनुसूची 341 यह स्पष्ट करती है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा मिलता है।
ईसाई या मुस्लिम धर्म में जाने के बाद यह दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है, जब तक कि विशेष कानूनी छूट न दी गई हो।


क्या यह फैसला अंतिम है?

नहीं। पीड़ित पक्ष चाहे तो इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस मुद्दे पर विचार कर चुका है, लेकिन अब भी यह एक संवेदनशील और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है।


निष्कर्ष:

अगर कोई दलित व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अब SC/ST एक्ट जैसे कानूनों के तहत संरक्षण या विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता – आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट।


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