संपादकीय ✍️ By KSR, Editor at Boldvoices | दिनांक: 2 मई 2025


हमारे समय की चुनौती

आज के समय में जब हर ओर भागदौड़, तनाव, प्रतियोगिता और अस्थिरता का माहौल है, तब इंसान भीतर से खाली होता जा रहा है। भले ही हमारे पास मोबाइल, गाड़ियाँ, नौकरी, पैसा और बहुत कुछ हो, लेकिन दिल से हम अक्सर बेचैन और असंतुष्ट महसूस करते हैं। इस मानसिक असंतुलन का हल कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही छिपा है — सकारात्मक सोच और आध्यात्मिकता में।


सकारात्मक सोच क्या है और क्यों ज़रूरी है?

सकारात्मक सोच का मतलब है कि हम मुश्किल हालात में भी उम्मीद और हिम्मत बनाए रखें। इसका मतलब यह नहीं कि हम परेशानियों को नज़रअंदाज़ करें, बल्कि यह है कि हम उन परेशानियों को कैसे देखते हैं, उसमें बदलाव लाएँ।

एक सकारात्मक सोच वाला इंसान हर समस्या में एक सीख ढूँढता है। अगर नौकरी नहीं मिली, तो वह कहता है – “शायद इससे कुछ बेहतर मिलने वाला है।” अगर कोई अपने साथ बुरा व्यवहार करता है, तो वह कहता है – “यह उसका व्यवहार है, मेरा नहीं।”

जब हम इस तरह सोचना शुरू करते हैं, तो हमारा मन शांत रहता है, शरीर बीमारियों से बचा रहता है और रिश्तों में मिठास बनी रहती है।


आध्यात्मिकता का अर्थ और जीवन में भूमिका

अक्सर लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिकता का मतलब मंदिर जाना, पूजा करना या साधु बन जाना है। लेकिन सच्ची आध्यात्मिकता का मतलब है — अपने भीतर झाँकना, आत्मा की आवाज़ सुनना, और यह समझना कि हम केवल शरीर नहीं हैं, हम एक चेतन आत्मा हैं।

जब इंसान आध्यात्मिक बनता है, तो वह क्रोध, घमंड और लोभ जैसी चीज़ों से ऊपर उठने लगता है। उसका मन स्थिर होता है, और वह हर इंसान में ईश्वर का अंश देखने लगता है। ऐसे व्यक्ति से न तो कोई डरता है, न कोई उससे दुःखी होता है। वह जहाँ भी जाता है, वहाँ शांति और सुकून फैलता है।


क्या है दोनों के बीच संबंध?

सकारात्मक सोच और आध्यात्मिकता दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। आध्यात्मिक इंसान अपने जीवन की गहराइयों को समझता है, इसलिए वह हर परिस्थिति को एक बड़ी दृष्टि से देखता है — यही सकारात्मक सोच है। वहीं, जो व्यक्ति हर बात में अच्छा देखता है, वह धीरे-धीरे आत्मा के स्तर पर सोचने लगता है — और आध्यात्मिक बनता है।

उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति रोज़ ध्यान करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे शांत होता है। जब मन शांत होता है, तो वह हर परिस्थिति को सोच-समझकर देखता है, प्रतिक्रिया नहीं देता। यही तो है सकारात्मक सोच। और ध्यान खुद एक आध्यात्मिक अभ्यास है।

इस तरह दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।


इन्हें जीवन में कैसे अपनाएँ?

यह बात तो साफ है कि इन दोनों को अपनाए बिना आज का जीवन केवल एक दौड़ बनकर रह गया है। लेकिन इसे जीवन में उतारना कोई कठिन काम नहीं है।

  • रोज़ सुबह 10 मिनट ध्यान करें। आँखें बंद करके केवल साँस पर ध्यान दें। यह मन को एक दिशा में लाता है।
  • हर रात सोने से पहले तीन चीज़ों के लिए धन्यवाद दें। इससे हम हर दिन को सराहना सीखते हैं।
  • अच्छे और सकारात्मक लोगों के साथ समय बिताएँ। बुरे विचार अक्सर बुरी संगति से ही आते हैं।
  • सेवा करें। किसी ज़रूरतमंद की मदद करें, चाहे एक मुस्कान से ही क्यों न हो।
  • अध्यात्म से जुड़ी किताबें पढ़ें। जैसे— भगवद गीता, संत कबीर या संत तुलसीदास की वाणी।

नीचे दिए गए उदाहरण सकारात्मक सोच और आध्यात्मिकता दोनों पहलुओं को सरलता से उजागर करते हैं।


एक बार एक शिष्य ने परमहंस जी से पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई मुझे गाली दे या अपमान करे, तो क्या मुझे चुप रहना चाहिए?”
परमहंस जी मुस्कराए और बोले, “यदि कोई तुम्हें ज़हर खाने को दे, तो क्या तुम खा लोगे?”
शिष्य ने तुरंत मना किया।
गुरुदेव ने कहा, “तो फिर दूसरों के कटु वचनों को क्यों अपने अंदर उतारते हो? छोड़ दो उन्हें वहीं पर।”

यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण है—नकारात्मकता को अपने अंदर न आने देना, यही सच्ची सकारात्मक सोच है।


जब अब्राहम लिंकन छोटे थे, तो वे बेहद गरीब परिवार से थे। गाँव में कई लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे।
उनकी माँ ने उनसे कहा, “बेटा, लोग तुम्हें जैसा देखना चाहते हैं, वैसा मत बनो। जो तुम हो, वह रहो। तुम जो सोचते हो, वही तुम्हारा भविष्य बनाएगा।”

यह शिक्षा न केवल सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित करती है, बल्कि आत्म-विश्वास और आंतरिक शक्ति पर भी ज़ोर देती है—जो आध्यात्मिकता का आधार है। हम जानते हैं की अब्राहम लिंकन भविष्य में कितने महान नेता बने।


आत्मा को भी चाहिए पोषण

हम रोज़ शरीर के लिए खाना खाते हैं, लेकिन आत्मा का भोजन क्या है? सकारात्मक सोच और आध्यात्मिकता ही आत्मा का पोषण हैं। अगर हम केवल शरीर को सजाते रहेंगे और आत्मा को भूखा छोड़ देंगे, तो कभी शांति नहीं मिलेगी।

इसलिए ज़रूरत है कि हम थोड़ा समय खुद के लिए निकालें। अपने विचारों को साफ़ करें, आत्मा से जुड़ें और एक नया दृष्टिकोण अपनाएँ। यही आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।


अंत में एक पंक्ति:

“जीवन बदलने के लिए किसी चमत्कार की ज़रूरत नहीं — बस सोच बदलनी चाहिए, और आत्मा से जुड़ना चाहिए।”


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