रिपोर्ट: Team of Boldvoices | 2 मई 2025

दिल्ली हाईकोर्ट ने योगगुरु बाबा रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद को सख्त चेतावनी दी है कि वे सार्वजनिक मंचों पर हमदर्द की मशहूर ड्रिंक ‘रूह अफज़ा’ को लेकर कोई भी सांप्रदायिक टिप्पणी ना करें। विशेष रूप से ‘शरबत-जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद करने का आदेश दिया गया है।
🔎 मामला क्या है?
हमदर्द लैबोरेट्रीज (India), जो ‘रूह अफ़ज़ा’ ब्रांड की निर्माता है, ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बाबा रामदेव और पतंजलि के प्रतिनिधि उनकी ब्रांड की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हमदर्द ने कोर्ट को बताया कि बाबा रामदेव ने अपने इंटरव्यू और बयानों में ‘रूह अफ़ज़ा’ को “शरबत जिहाद” जैसा कहा, जिससे न केवल ब्रांड की बदनामी हुई, बल्कि एक खास धार्मिक समुदाय को भी निशाना बनाया गया।
⚖️ कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस संजीव नारूला की एकल पीठ ने कहा:
“व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के नाम पर किसी प्रॉडक्ट को धार्मिक रंग देना पूरी तरह गलत है। यह न केवल भ्रामक है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरनाक भी है।”
कोर्ट ने साफ कहा कि:
- पतंजलि और उसके प्रवक्ताओं को आदेश दिया जाता है कि वे ‘रूह अफ़ज़ा’ के खिलाफ कोई भी सांप्रदायिक या धार्मिक टिप्पणी न करें।
- ‘शरबत जिहाद’ जैसे शब्दों का तुरंत उपयोग बंद किया जाए।
- यदि ऐसा दोबारा होता है, तो यह कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी।

🧾 कोर्ट में पेश सबूत
हमदर्द ने कोर्ट में कुछ वीडियो और बयानों के अंश भी पेश किए, जिनमें पतंजलि के प्रतिनिधि यह कहते पाए गए कि:
“हमारी शरबतें पवित्र हैं, जबकि बाजार में ‘शरबत जिहाद’ फैलाया जा रहा है।”
कोर्ट ने कहा कि इस तरह की भाषा विभाजनकारी है और एक ब्रांड के खिलाफ धार्मिक नफरत फैलाने का तरीका नहीं हो सकता।
🏛️ क्या कहा हमदर्द ने?
हमदर्द की तरफ से कहा गया कि:
- रूह अफ़ज़ा सिर्फ एक ब्रांड नहीं, भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का हिस्सा है।
- इसका इस्तेमाल दशकों से हर धर्म और समुदाय के लोग करते आ रहे हैं।
- इसे इस तरह “जिहादी” या सांप्रदायिक कहना न केवल अवैध है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के खिलाफ है।
📌 पतंजलि की सफाई
कोर्ट में पतंजलि की ओर से यह तर्क दिया गया कि:
- उन्होंने कभी सीधे तौर पर ‘रूह अफ़ज़ा’ का नाम नहीं लिया।
- उनके शब्दों को गलत तरीके से पेश किया गया।
लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि अगर शब्दों का मकसद एक खास ब्रांड की छवि बिगाड़ना और उसे सांप्रदायिक रंग देना है, तो यह गलत है और रोक लगनी चाहिए।
यह मामला केवल व्यापार या ब्रांड की प्रतिस्पर्धा का नहीं है, बल्कि भारत की विविधता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सौहार्द की भी परीक्षा है।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि:
- व्यापार के नाम पर नफरत की भाषा नहीं चलेगी।
- धार्मिक आधार पर ब्रांड को निशाना बनाना अस्वीकार्य है।
यह एक मिसाल है कि बाज़ार की प्रतिस्पर्धा भी गरिमा और जिम्मेदारी से होनी चाहिए।











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