लेखक: KSR, Editor at BoldVoices.in
प्रकाशन तिथि: 25 अप्रैल 2025
🕉️ प्रस्तावना
हिंदू धर्म को आमतौर पर अहिंसा के धर्म के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसके धर्मग्रंथों में कुछ परिस्थितियों में हिंसा को भी न्यायोचित माना गया है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य के बीच संतुलन की गहराई को दर्शाता है।

📖 अहिंसा की अवधारणा
अहिंसा का मूल अर्थ है – “किसी भी प्राणी को जान-बूझकर कष्ट न देना।”
हिंदू दर्शन में इसे उच्चतम नैतिक मूल्यों में से एक माना गया है। यह विचार उपनिषदों, भगवद गीता और महाभारत में स्पष्ट रूप से सामने आता है।
- उपनिषदों में बताया गया है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक समान है, इसलिए किसी को कष्ट देना आत्मा को कष्ट देने जैसा है।
- भगवद गीता में अर्जुन का युद्ध से हटना भी इसी भाव से जुड़ा था, लेकिन आगे उसका समाधान “धर्म युद्ध” के रूप में किया गया।

⚔️ हिंसा कब उचित मानी गई?
हिंदू ग्रंथों में हिंसा को केवल रक्षा, धर्म की रक्षा, और अत्याचार के विरोध में ही उचित ठहराया गया है।
- रामायण में भगवान राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध किया — क्योंकि रावण ने अधर्म किया था।
- महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने को प्रेरित किया।
- मनुस्मृति और धर्मसूत्रों में राज्य और समाज की रक्षा के लिए क्षत्रियों को “धर्म के अनुसार हिंसा” करने का अधिकार दिया गया है।
इसका अर्थ है कि हिंसा को कभी “पहला विकल्प” नहीं माना गया, लेकिन अनिवार्यता की स्थिति में उसे धर्म का अंग भी माना गया।
⚖️ हिंसा और धर्म का संतुलन
हिंदू दर्शन में जीवन का मूल उद्देश्य है — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
धर्म की रक्षा के लिए, कभी-कभी अहिंसा का त्याग कर के हिंसा का प्रयोग स्वीकार्य माना गया है।
इसमें मुख्य बात यह है कि हिंसा स्वार्थवश, क्रोध में या प्रतिशोध में नहीं होनी चाहिए — बल्कि केवल उस स्थिति में जब अधर्म का अंत आवश्यक हो।
🙏 आधुनिक प्रसंग में क्या सीखें?
- अहिंसा आज भी सर्वोच्च नीति है — व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर।
- परंतु जब बात राष्ट्र, धर्म, या मासूम लोगों की रक्षा की हो, तब कर्तव्यनिष्ठ हिंसा भी धर्म संगत मानी जा सकती है।
- महात्मा गांधी ने अहिंसा को जीवन दर्शन बना दिया, वहीं सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिशों से युद्ध के लिए हिंसा का समर्थन किया — और दोनों की प्रेरणा हिंदू दर्शन ही रहा।
🔚 सार
हिंदू धर्मग्रंथों में अहिंसा को आदर्श माना गया है, लेकिन यह एक निर्जीव नीति नहीं, बल्कि स्थितिजन्य नैतिकता है। जहाँ सहिष्णुता आवश्यक है, वहाँ हिंसा अनुचित है; और जहाँ अधर्म सिर उठा ले, वहाँ उसका प्रतिकार करना ही धर्म है।












Leave a comment