🌟 1. युद्ध तभी जब धर्म की रक्षा करनी हो

श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा सिद्धांत यह था कि जब अधर्म (अन्याय, अत्याचार, छल, हिंसा) बढ़ जाए और शांति के सभी रास्ते बंद हो जाएं, तब धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना आवश्यक हो जाता है।
➡ उन्होंने पांडवों को पहले शांतिपूर्वक उनका हक दिलाने की कोशिश की। लेकिन जब दुर्योधन ने एक सुई की नोक जितनी ज़मीन देने से भी मना कर दिया, तब श्रीकृष्ण ने कहा – अब युद्ध ही एकमात्र रास्ता है।


💪 2. कर्तव्य से पीछे हटना भी पाप है

जब अर्जुन ने युद्ध भूमि में अपने रिश्तेदारों को देखकर हथियार छोड़ दिए और कहा कि मैं ये युद्ध नहीं करूंगा, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि अगर तुम अपने कर्तव्य से पीछे हटोगे, तो यह पलायन कहलाएगा।
➡ उन्होंने बताया कि एक योद्धा (क्षत्रिय) का धर्म है – न्याय के लिए युद्ध करना।


🧘‍♂️ 3. निष्काम भाव से युद्ध करो

श्रीकृष्ण ने यह नहीं कहा कि युद्ध करो और जीतो। उन्होंने कहा – कर्म करो, फल की चिंता मत करो।
➡ इसका मतलब था – तुम धर्म और न्याय के लिए युद्ध करो, लेकिन अपने निजी स्वार्थ, मोह, या लालच से प्रेरित होकर नहीं। बस अपने कर्तव्य का पालन करो।


🛡️ 4. दुष्टों का विनाश ज़रूरी है

श्रीकृष्ण ने कहा कि अगर दुष्टों को रोका नहीं गया, तो वे पूरे समाज को अंधकार में ले जाएंगे।
➡ युद्ध से बुराई का अंत होता है और सत्य की जीत होती है। इसलिए यह जरूरी था कि पांडव युद्ध करें और अधर्मी कौरवों को रोका जाए।


🔄 5. शांति से पहले युद्ध भी ज़रूरी हो सकता है

हालाँकि श्रीकृष्ण ने युद्ध को पहली पसंद नहीं माना। उन्होंने पहले शांति के प्रयास किए – दूत बनकर गए, समझौता करवाने की कोशिश की। लेकिन जब सब असफल हो गया, तो उन्होंने साफ कहा – अब युद्ध ही धर्म है।


✨ सार:

भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध को महिमामंडित नहीं किया, लेकिन यह सिखाया कि जब अन्याय, अहंकार और अत्याचार हावी हो जाएं, तब धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना पवित्र कर्म है – यह युद्ध हिंसा नहीं, धर्मयुद्ध होता है।


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