April 21 , 2025 | New Delhi | Curated By the team of Boldvoices.in

परिचय: मारुति घोटाला 1970 के दशक की शुरुआत में हुआ एक प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक घोटाला था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे। यह घोटाला मारुति लिमिटेड नामक एक कंपनी की स्थापना और संचालन से जुड़ा हुआ था, जिसका उद्देश्य भारत में एक “सस्ती और जन-सामान्य की कार” बनाना था।
🔹 पृष्ठभूमि
- साल: 1971
- घटनास्थल: नई दिल्ली, भारत
- प्रमुख पात्र:
- संजय गांधी – इंदिरा गांधी के छोटे बेटे, जिन्हें कंपनी का प्रमुख बनाया गया।
- इंदिरा गांधी – तत्कालीन प्रधानमंत्री
- राजनारायण – समाजवादी नेता, जिन्होंने घोटाले का खुलासा किया।
- शाह आयोग – जिसने आपातकाल के बाद इस मामले की जांच की।
🔹 घोटाले की कहानी
- कंपनी की स्थापना:
- 1971 में संजय गांधी ने Maruti Limited नामक एक कंपनी की शुरुआत की।
- इसका उद्देश्य था – भारत में आम आदमी के लिए एक सस्ती कार बनाना।
- सरकार ने इस योजना को “राष्ट्रीय महत्व” का दर्जा दिया।
- अनुचित सरकारी सहयोग:
- सरकार ने इस निजी कंपनी को ज़मीन, लाइसेंस, पूंजी, और तकनीकी मदद देने में कोई कोताही नहीं की।
- बिना किसी अनुभव या तकनीकी योग्यता के संजय गांधी को कंपनी का पूर्ण नियंत्रण दिया गया।
- कंपनी को गुड़गांव (हरियाणा) में मुफ्त ज़मीन उपलब्ध कराई गई।
- प्रदर्शन और भ्रष्टाचार:
- कई वर्षों तक कंपनी एक भी कार का उत्पादन नहीं कर पाई।
- तकनीकी साझेदार चुनने में पारदर्शिता नहीं थी।
- सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग और राजनीतिक प्रभाव का उपयोग हुआ।
- राजनारायण और न्यायिक जांच:
- 1975 में आपातकाल के दौरान यह मामला दबा रहा, लेकिन 1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आई, तो राजनारायण ने इस पर केस किया।
- मामला अलाहाबाद हाईकोर्ट में गया और संजय गांधी की भूमिका पर सवाल उठे।
- शाह आयोग ने इस मामले में जांच की और पाया कि कंपनी के गठन व संचालन में भारी अनियमितताएं और राजनीतिक हस्तक्षेप हुए।
🔹 नतीजा
- 1977 के बाद जनता सरकार ने इस कंपनी को राष्ट्रीयकरण कर दिया।
- Maruti Limited को सरकार ने अपने हाथ में लेकर इसे Maruti Udyog Ltd. बनाया।
- बाद में 1980 के दशक में जापानी कंपनी Suzuki के साथ संयुक्त उद्यम शुरू हुआ, जिससे Maruti Suzuki का जन्म हुआ – जो आज भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी है।
- संजय गांधी की छवि को इस घोटाले से बड़ा धक्का लगा।
🧾 शाह आयोग की रिपोर्ट – मारुति घोटाले पर सारांश
शाह आयोग की स्थापना 1977 में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य 1975-77 के आपातकाल के दौरान हुई अनियमितताओं और सत्ता के दुरुपयोग की जांच करना था। इस आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे.सी. शाह थे। इसकी तीसरी और अंतिम रिपोर्ट (6 अगस्त 1978) में मारुति घोटाले पर विस्तृत टिप्पणी की गई।
🔍 प्रमुख निष्कर्ष
1. सत्ता का दुरुपयोग और भाई-भतीजावाद
- आयोग ने यह स्पष्ट किया कि संजय गांधी को किसी भी तरह का तकनीकी या व्यावसायिक अनुभव नहीं था, फिर भी उन्हें एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना का पूरा नियंत्रण दे दिया गया।
- यह प्रधानमंत्री पद का दुरुपयोग था, जिसमें परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी नीतियों और संसाधनों का सहारा लिया गया।
2. कानूनी और प्रक्रियात्मक अनियमितताएं
- मारुति लिमिटेड को लाइसेंस और अन्य जरूरी अनुमति बिना किसी वैध तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन के दी गई।
- सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, जैसे कि भूमि आवंटन, विदेशी सहयोगी की खोज, और उत्पादन योजना।
3. विफलता और गैर-पारदर्शिता
- कंपनी अपनी घोषित समय सीमा में एक भी कार नहीं बना सकी।
- निवेशकों, जनता और संसद को गुमराह किया गया।
- आयोग ने कहा कि यह परियोजना एक “प्रशासनिक और नीति निर्माण की असफलता” थी।
4. राजनीतिक हस्तक्षेप
- सरकारी अधिकारियों पर दबाव डाला गया कि वे संजय गांधी की कंपनी को सहायता दें, चाहे वह कानून के अनुरूप हो या नहीं।
- इस परियोजना को “राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न” बताकर आलोचना को दबाया गया।
🛑 आयोग की अनुशंसा
शाह आयोग ने सुझाव दिया कि:
- भविष्य में किसी भी राष्ट्रीय परियोजना में व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर निर्णय नहीं होने चाहिए।
- सभी औद्योगिक नीतियों को पारदर्शिता, योग्यता और प्रक्रियात्मक न्याय के आधार पर लागू किया जाना चाहिए।
- इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और राजनीतिक हस्तियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
🔚 निष्कर्ष
मारुति घोटाला स्वतंत्र भारत के शुरुआती बड़े राजनीतिक और औद्योगिक घोटालों में से एक था। इसने यह दिखाया कि कैसे राजनीतिक शक्ति और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर एक निजी व्यक्ति को लाभ पहुंचाया गया। हालांकि, समय के साथ यह परियोजना सफल बिजनेस मॉडल में बदल गई, लेकिन इसकी शुरुआत घोटाले और विवादों से भरी रही।











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