April 21 , 2025 | New Delhi | Curated By the team of Boldvoices.in

📌 परिचय
1957 में सामने आया मुंद्रा घोटाला (Mundhra Scam) स्वतंत्र भारत के पहले बड़े वित्तीय घोटालों में से एक था। यह घोटाला तब चर्चा में आया जब सरकारी बीमा कंपनी LIC (Life Insurance Corporation of India) ने एक विवादास्पद व्यवसायी हरिदास मुंद्रा की असफल कंपनियों में बड़ी मात्रा में निवेश किया।
👤 मुख्य किरदार
- हरिदास मुंद्रा – एक प्रभावशाली उद्योगपति जिनकी कई कंपनियाँ घाटे में चल रही थीं।
- टी. टी. कृष्णमाचारी – तत्कालीन वित्त मंत्री।
- फिरोज गांधी – सांसद (और जवाहरलाल नेहरू के दामाद), जिन्होंने इस घोटाले को उजागर किया।
- जस्टिस एम. सी. चगला – जांच आयोग के अध्यक्ष, जिन्होंने पूरी रिपोर्ट तैयार की।
💸 घोटाले का तरीका
- मुंद्रा पर कई बैंकों का कर्ज बकाया था और उनकी कंपनियाँ दिवालिया होने के कगार पर थीं।
- फिर भी LIC ने बिना उचित जांच-पड़ताल के 1.26 करोड़ रुपये (उस समय की बड़ी राशि) की पूंजी मुंद्रा की छह घाटे में चल रही कंपनियों में निवेश कर दी।
- यह निर्णय बिना बोर्ड मीटिंग के अचानक लिया गया और इस पर तत्कालीन वित्त मंत्रालय की छाया मानी जाती है।
🔍 फिरोज गांधी का खुलासा
- फिरोज गांधी, जो कि लोकसभा सदस्य थे और प्रधानमंत्री नेहरू के दामाद भी, उन्होंने संसद में सवाल उठाए:
- LIC जैसी सार्वजनिक संस्था ने किस आधार पर इतनी बड़ी राशि निवेश की?
- क्या यह सरकार की मिलीभगत से हुआ?
- उनकी दृढ़ता और पारदर्शिता की मांग के कारण संसद में हड़कंप मच गया।
🧑⚖️ जांच आयोग (चगला आयोग)
- प्रधानमंत्री नेहरू ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस एम. सी. चगला के नेतृत्व में एक जांच आयोग नियुक्त किया।
- चगला आयोग ने पाया कि:
- निवेश प्रक्रिया में भारी अनियमितताएँ थीं।
- वित्त मंत्रालय की ओर से LIC पर दबाव डाला गया था।
- वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी की भूमिका संदिग्ध थी।
🧾 परिणाम
- टी. टी. कृष्णमाचारी ने इस्तीफा दे दिया।
- हरिदास मुंद्रा को 6 साल की सजा सुनाई गई।
- LIC की निवेश नीति में बदलाव लाया गया और निगरानी कड़ी की गई।
- यह घोटाला लोकतंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रतीक बना।
📝 प्रभाव
- इस घोटाले ने दिखाया कि कैसे सत्ता में बैठे लोगों के गलत निर्णय सार्वजनिक संस्थाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
- फिरोज गांधी की छवि एक साहसी और निडर नेता के रूप में उभरी।
- यह स्वतंत्र भारत का पहला उदाहरण था जहाँ संसद की ताकत और जवाबदेही से भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हुई।











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