April 21 , 2025 | New Delhi | Curated By the team of Boldvoices.in

🔍 घोटाले का पृष्ठभूमि:
भारत को आज़ादी मिले केवल एक साल ही हुआ था। देश की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सेना को तत्काल कुछ जरूरी सामानों की आवश्यकता थी। उसी समय कश्मीर में कबायली हमले हो रहे थे, और भारतीय सेना को तेजी से वाहनों (जीपों) की जरूरत थी।
🚙 क्या था घोटाला?
भारत सरकार ने ब्रिटेन की एक प्राइवेट फर्म Anti-Mistantes Morris Commercial Cars Ltd. से 155 जीपों की खरीद का अनुबंध किया। इस डील की खास बात यह थी:
- यह सौदा बिना किसी टेंडर या खुली निविदा के किया गया।
- भुगतान की पूरी रकम एक साथ एडवांस में कर दी गई।
- केवल 49 जीपें ही डिलीवर की गईं, वो भी खराब गुणवत्ता की।
- बाकी जीपें कभी नहीं पहुंचीं।
🕴️ मुख्य व्यक्ति:
- वी.के. कृष्णा मेनन, उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर थे।
- उन्होंने ही यह पूरा सौदा अपने स्तर पर तय किया था, बिना रक्षा मंत्रालय या वित्त मंत्रालय की पूरी मंजूरी के।
⚖️ जांच और कार्रवाई क्या हुई?
- मामला संसद में उठा। विपक्ष ने इसे घोटाला कहा और सवाल उठाए।
- सरकार ने पहले जांच की बात की, लेकिन बाद में 1955 में केस बंद कर दिया गया।
- तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मेनन का बचाव किया और उन्हें 1957 में रक्षा मंत्री बना दिया।
📉 जनता की प्रतिक्रिया:
- यह घोटाला स्वतंत्र भारत के पहले बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में से एक था।
- इसे सरकार की शुरुआती नाकामी और भाई-भतीजावाद के प्रतीक के रूप में देखा गया।
❗ निष्कर्ष:
जीप घोटाला सिर्फ कुछ जीपों की खरीद में धोखाधड़ी नहीं था, बल्कि यह इस बात का संकेत था कि कैसे राजनीतिक संरक्षण में जवाबदेही से बचा जा सकता है। यह घोटाला आने वाले कई घोटालों की शुरुआत का संकेत बना।












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