April 20 , 2025 | New Delhi | Curated By the team of Boldvoices.in

हाल ही में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और भाजपा के कुछ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाया कि उसने संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हुए अपनी “सीमाएं पार की हैं“। इस बयान ने राजनीतिक और कानूनी जगत में तीव्र बहस छेड़ दी है। कई दलों ने समर्थन या विरोध में अपनी प्रतिक्रिया दी है।
🏛️ भाजपा का पक्ष
निशिकांत दुबे (भाजपा सांसद):
उन्होंने कहा, “अगर कोर्ट ही कानून बनाएगा तो संसद को बंद कर देना चाहिए।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णय देश में “धार्मिक तनाव” बढ़ा रहे हैं।

भाजपा का औपचारिक रुख:
पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का सम्मान सर्वोपरि है और सांसदों के बयान उनके “व्यक्तिगत विचार” हैं, पार्टी लाइन नहीं।
🗣️ विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया
कपिल सिब्बल (कांग्रेस):
“जब सरकार को कोर्ट के फैसले पसंद नहीं आते तो वह उसे सीमाएं पार करने का आरोप लगाकर बदनाम करने की कोशिश करती है।”
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।
असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM):
“सुप्रीम कोर्ट को धमकाना भाजपा की पुरानी आदत है। ये लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए खतरनाक है।”
टीएमसी और डीएमके ने भी इस तरह के बयानों की निंदा की और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने की अपील की।
⚖️ वकीलों और कानूनी समुदाय की प्रतिक्रिया
अनस तनवीर (वरिष्ठ वकील):
उन्होंने भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की याचिका दायर करने के लिए अटॉर्नी जनरल से अनुमति मांगी है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका का काम केवल कानून की व्याख्या करना नहीं बल्कि संविधान की रक्षा करना भी है। संसद और कोर्ट को एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए।

🔍 निष्कर्ष
यह विवाद कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन और सीमाओं की संवैधानिक परिभाषा से जुड़ा हुआ है। राजनीतिक बयानबाज़ी इस संतुलन को प्रभावित कर सकती है। इस मुद्दे पर स्पष्ट संवाद और परिपक्वता की आवश्यकता है ताकि लोकतंत्र की संस्थाएं मजबूती से काम कर सकें।












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