
प्रकरण की पृष्ठभूमि
2022 में केरल के पलक्कड़ जिले में आरएसएस नेता श्रीनिवासन की हत्या का मामला सामने आया था। इस हत्या में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के 26 सदस्यों को आरोपी बनाया गया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले की जांच की और इन सभी पर षड्यंत्र, हत्या और आतंकी गतिविधियों से संबंधित गंभीर आरोप लगाए।
इन आरोपियों में से 17 को केरल उच्च न्यायालय ने 25 जून 2024 को सशर्त ज़मानत दी थी। एनआईए ने इस ज़मानत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
16 अप्रैल 2025 को, सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ — न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह — ने एनआईए की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि:
- ज़मानत आदेश एक वर्ष से अधिक पुराना है।
- अगर ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो एनआईए को विशेष अदालत या उच्च न्यायालय के पास जाकर ज़मानत रद्द करने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि न हो।
केरल हाईकोर्ट द्वारा तय की गई ज़मानत की शर्तें
- आरोपियों को अपने मोबाइल नंबर और जीपीएस लोकेशन जांच एजेंसियों के साथ साझा करनी होगी।
- उन्हें केरल राज्य छोड़ने की अनुमति नहीं है।
- सभी को अपने पासपोर्ट जमा कराने होंगे।
- मोबाइल फोन हमेशा ऑन और एक्टिव स्थिति में रखने होंगे।

एनआईए की आपत्ति और कोर्ट की टिप्पणी
एनआईए ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि आरोपी ज़मानत की शर्तों का पालन नहीं कर रहे और इससे जांच प्रभावित हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि यदि ऐसा है, तो संबंधित विशेष अदालत या उच्च न्यायालय में ज़मानत रद्द करने की मांग की जाए। शीर्ष अदालत ने खुद इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
निष्कर्ष
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि ज़मानत रद्द करने की प्रक्रिया को लेकर कानूनी मार्ग का पालन किया जाना चाहिए। एनआईए जैसे शीर्ष जांच एजेंसी को भी यह दिखाया गया कि उन्हें उचित न्यायिक व्यवस्था के तहत ही कार्रवाई करनी चाहिए। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की संतुलित सोच और प्रक्रियात्मक न्याय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
April 16 , 2025 | New Delhi | By Gurdeep Singh, Senior Editor at Boldvoices.in











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