Editorial by Gurdeep Singh, Senior Editor
अमेरिका और चीन के बीच शक्ति संघर्ष 21वीं सदी की सबसे निर्णायक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बन चुका है। अमेरिका ने बहुआयामी रणनीतियों से चीन के प्रभाव को आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और कूटनीतिक मोर्चों पर घेरना शुरू कर दिया है। हाल ही में अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए भारी टैरिफ और सहयोगी देशों के साथ बनाए गए गठबंधनों ने इस संघर्ष को और तेज कर दिया है।
1. आर्थिक युद्ध: टैरिफ और वैश्विक व्यापार दबाव
▶ हाल की घटनाएं:
- मार्च 2025 में अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर 145% तक का टैरिफ लागू किया।
- खासकर फेंटेनाइल जैसे संवेदनशील उत्पादों पर 20% अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, जिससे चीन की फार्मास्युटिकल निर्यात व्यवस्था को गहरा झटका लगा।
- चीन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 125% तक के टैरिफ अमेरिका से आने वाले उत्पादों पर लगा दिए, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिरता ने उसे अधिक नुकसान नहीं पहुँचाया।
▶ प्रभाव:
- चीन के निर्यातक अमेरिकी बाज़ार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं।
- अमेरिकी कंपनियाँ अब भारत, वियतनाम, मैक्सिको जैसे देशों में मैन्युफैक्चरिंग को शिफ्ट कर रही हैं।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चीन अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
2. तकनीकी घेराबंदी: चिप युद्ध और डिजिटल प्रतिबंध
▶ अमेरिका के कदम:
- चीन को एडवांस चिप्स (AI, हाई-परफॉर्मेंस कम्प्यूटिंग, सैन्य उपयोग) की आपूर्ति पर प्रतिबंध।
- Huawei, ZTE, TikTok जैसी कंपनियों पर प्रतिबंध और डेटा सुरक्षा के नाम पर वैश्विक सतर्कता।
- अमेरिकी सहयोगी देशों को भी चीन की तकनीक से दूरी बनाए रखने का दबाव।
▶ परिणाम:
- चीन अब तक 7nm से नीचे की चिप्स उत्पादन में असफल रहा है, जिससे उसका AI और रक्षा क्षेत्र प्रभावित हो रहा है।
- अमेरिका और ताइवान की कंपनियाँ (जैसे TSMC, Intel) वैश्विक तकनीकी नेतृत्व बनाए हुए हैं।
3. सैन्य घेराबंदी: QUAD, AUKUS और इंडो-पैसिफिक रणनीति
▶ रणनीतिक गठबंधन:
- QUAD (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया): चीन को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलित करने के लिए नौसैनिक अभ्यास और साझा सुरक्षा नीति।
- AUKUS (अमेरिका, UK, ऑस्ट्रेलिया): ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर सबमरीन तकनीक देने की योजना, जिससे चीन की समुद्री रणनीति पर असर पड़ा।
▶ ताइवान और दक्षिण चीन सागर:
- अमेरिका ने ताइवान को सैन्य हथियार और राजनयिक समर्थन देना जारी रखा है।
- दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी नौसेना की फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन्स (FONOPs) चीन की दावेदारी को खुली चुनौती दे रही हैं।
4. कूटनीतिक दबाव और वैश्विक समर्थन
▶ मानवाधिकार मुद्दे:
- अमेरिका ने शिनजियांग में उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों, हांगकांग की स्वायत्तता और तिब्बत के दमन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है।
- कुछ चीनी अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध और संपत्ति जब्त करने जैसे प्रतिबंध लगाए गए।
▶ वैश्विक गठजोड़:
- अमेरिका ने यूरोपीय संघ, NATO, और G7 देशों के साथ मिलकर चीन के खिलाफ रणनीतिक और व्यापारिक नीतियाँ बनाई हैं।
- भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के साथ संबंध मज़बूत कर चीन के वैकल्पिक नेतृत्व की स्थापना की जा रही है।
5. सूचना युद्ध और मीडिया नैरेटिव
- पश्चिमी मीडिया चीन के दमनकारी मॉडल की आलोचना कर रहा है और अमेरिकी लोकतांत्रिक मॉडल को उजागर कर रहा है।
- चीनी प्रचार माध्यमों को अमेरिका और यूरोप में सीमित किया गया है।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चीनी प्रभाव को कम करने के लिए कई तरह के एल्गोरिद्मिक बदलाव लाए गए हैं।
निष्कर्ष:
अमेरिका ने चीन की वैश्विक बढ़त को रोकने के लिए बहुस्तरीय रणनीतियाँ अपनाई हैं। ताज़ा टैरिफ युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, सैन्य घेराबंदी, और कूटनीतिक दबाव के ज़रिए अमेरिका चीन की ‘बैंड बजाने’ में काफी हद तक सफल रहा है। हालांकि, यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और अगले कुछ वर्षों में यह और भी निर्णायक रूप ले सकता है।













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