भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए वार्ता तेज़ी से आगे बढ़ रही है, जिसका लक्ष्य इस वर्ष के पतझड़ (शरद ऋतु) तक समझौता संपन्न करना है। यह पहल वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत की स्थिति को और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।


पृष्ठभूमि

अप्रैल 2025 में, अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी आयातों पर 10% का सार्वभौमिक शुल्क लागू कर दिया था, जिसमें कुछ देशों के लिए यह दर और भी अधिक थी। भारत पर यह शुल्क 26% तक बढ़ा दिया गया, जिससे भारतीय निर्यातकों में चिंता बढ़ गई। हालांकि, भारत सरकार ने प्रतिशोधी कदम उठाने के बजाय बातचीत और समझौते के रास्ते को प्राथमिकता दी।


वर्तमान वार्ता का स्वरूप

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच हाल ही में हुई बातचीत में दोनों नेताओं ने व्यापार समझौते को शीघ्रता से अंतिम रूप देने की आवश्यकता पर जोर दिया। जयशंकर ने बताया कि बातचीत में इंडो-पैसिफिक, भारतीय उपमहाद्वीप, यूरोप, मध्य पूर्व और कैरिबियन क्षेत्र जैसे मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।


भारत की रणनीति

भारत का उद्देश्य इस व्यापार समझौते के माध्यम से द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 500 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना है। इसके लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जिनमें अमेरिकी लक्ज़री वस्तुओं पर शुल्क कम करना, डिजिटल सेवाओं पर टैक्स में छूट देना और लगभग 23 बिलियन डॉलर मूल्य के अमेरिकी आयातों पर रियायत देना शामिल है।


चुनौतियाँ और संभावनाएँ

हालाँकि वार्ता सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है, लेकिन कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भारत में इन क्षेत्रों में लाखों लोगों की जीविका जुड़ी हुई है, जिससे इस समझौते पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ भी हो सकती हैं।


निष्कर्ष

भारत और अमेरिका के बीच यह प्रस्तावित व्यापार समझौता न केवल दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार संतुलन में भी एक नया अध्याय जोड़ेगा। आने वाले महीनों में यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि होगी।


Curated by Gurdeep Singh, Senior Editor at http://www.boldvoices.in

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