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शिवसेना (UBT) का रुख स्पष्ट: वक्फ संशोधन विधेयक पर अब कोई कानूनी लड़ाई नहीं

संजय राउत का बड़ा बयान

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी अब वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को लेकर सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएगी। उन्होंने कहा:

“हमने संसद में विधेयक का विरोध किया, अपनी बात रखी, और अब इस मामले को समाप्त मानते हैं। हमारे लिए अब यह फाइल बंद हो गई है।”

इस बयान से यह साफ हो गया है कि शिवसेना (UBT) अब इस मुद्दे पर आगे कोई कानूनी कदम नहीं उठाएगी।


वक्फ संशोधन विधेयक पर पहले जताई थी चिंता

संजय राउत ने पहले इस विधेयक की संसद में तीखी आलोचना की थी। उनका कहना था कि:

  • सरकार इस कानून के ज़रिए वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण पाना चाहती है।
  • यह विधेयक मुसलमानों के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा करने के बजाय इन संपत्तियों के व्यवसायिक उपयोग की दिशा में उठाया गया कदम है।
  • राउत ने दावा किया कि भारत में वक्फ संपत्तियों की कीमत लगभग 2 लाख करोड़ रुपये है, और सरकार की नजर उन्हीं पर है।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं और कानूनी चुनौती

जहां शिवसेना (UBT) पीछे हट गई है, वहीं अन्य विपक्षी नेताओं ने इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसमें प्रमुख नाम शामिल हैं:

  • असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM सांसद)
  • मोहम्मद जावेद (कांग्रेस नेता)
  • अमानतुल्लाह खान (आप विधायक)

इन सभी नेताओं ने आरोप लगाया है कि यह कानून वक्फ संस्थाओं की स्वायत्तता को खत्म कर देगा और सरकार को उनकी संपत्तियों में हस्तक्षेप का अधिकार देगा।


विधेयक की संसद में स्थिति

वक्फ संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पास कर दिया गया है:

  • राज्यसभा: विधेयक के पक्ष में 128 वोट, विपक्ष में 95 वोट
  • लोकसभा: पक्ष में 288 वोट, विपक्ष में 232 वोट

अब यह विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन जाएगा।


वक्फ संशोधन विधेयक 2025: क्या है इसमें?

यह विधेयक 1995 के वक्फ अधिनियम में कई महत्वपूर्ण संशोधन लाता है। इसके प्रमुख बिंदु हैं:

1. संपत्ति के पंजीकरण में बदलाव

अब वक्फ संपत्तियों को ज़िला प्रशासन के माध्यम से जांचा और पंजीकृत किया जाएगा, जिससे राज्य सरकार की भूमिका और नियंत्रण बढ़ेगा।

2. राज्य सरकारों को अधिक अधिकार

सरकार को वक्फ संपत्तियों की देखरेख, उनके उपयोग, और विवादों के समाधान में ज्यादा अधिकार दिए गए हैं।

3. डिजिटलीकरण और पारदर्शिता

विधेयक में वक्फ संपत्तियों के डिजिटल रिकॉर्ड बनाने और पारदर्शी प्रशासन सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

4. वक्फ बोर्ड की निगरानी

राज्य और केंद्र सरकारें वक्फ बोर्डों की निगरानी और उनकी कार्यप्रणाली की समीक्षा कर सकेंगी।


आलोचना क्यों हो रही है?

  • धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर खतरा: कई मुस्लिम नेताओं और संगठनों का मानना है कि यह विधेयक धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को कमजोर करेगा।
  • राजनीतिक दखल का डर: संशोधन के बाद सरकार वक्फ बोर्ड पर सीधे प्रभाव डाल सकती है, जिससे राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
  • कानूनी विवाद: पंजीकरण प्रक्रिया और संपत्तियों के अधिकार को लेकर अधिक विवाद पैदा हो सकते हैं।

निष्कर्ष

शिवसेना (UBT) ने वक्फ संशोधन विधेयक का संसद में विरोध तो किया, लेकिन अब उन्होंने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट नहीं जाने का निर्णय लिया है। वहीं, अन्य विपक्षी दल इसे कानूनी चुनौती दे चुके हैं। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और संपत्ति प्रबंधन से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है।


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