परिचय
राजीव गांधी भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर और भारत के छठे प्रधानमंत्री थे। उनका जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे थे। उनका जीवन और कार्य भारतीय राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाल चुके हैं।


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
राजीव गांधी का जन्म एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता, फ़िरोज़ गांधी, एक प्रसिद्ध पत्रकार थे, जबकि उनकी माँ इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। राजीव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दून स्कूल, देहरादून से प्राप्त की और बाद में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की।
राजीव गांधी और सोनिया गांधी का विवाह
राजीव गांधी और सोनिया गांधी का विवाह भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा जाता है। उनका विवाह 25 फरवरी 1968 को हुआ।
प्रारंभिक जीवन
सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ था और उनका नाम “सोनिया मैनो” था। उन्होंने अपनी शिक्षा अवश्य ही इटली में ग्रहण की। राजीव गांधी और सोनिया की पहली मुलाकात 1965 में हुई थी, जब राजीव अपनी पढ़ाई के कारण इंग्लैंड में थे।
विवाह का संयोग
राजीव और सोनिया का विवाह एक साधारण लेकिन बेहद सुंदर समारोह में हुआ। यह विवाह इस बात का प्रतीक था कि सोनिया ने भारतीय संस्कृति को अपनाया और भारतीय परिवार के पारंपरिक मूल्यों का सम्मान किया। उनके विवाह में केवल पारिवारिक सदस्य और करीबी दोस्त शामिल हुए थे।
जीवन का सफर
विवाह के बाद, सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। उन्हें कई सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय देखा गया। उनका राजीव गांधी के साथ जीवन, व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। उनके दो बच्चों, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का जन्म हुआ, जो आज भारतीय राजनीति में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं।
विवाह का महत्व
राजीव और सोनिया की शादी ने भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की। उनका संबंध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण रहा, और यह एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे एक पारिवारिक संवंध ने राजनीतिक सामर्थ्य को बढ़ाया।
इस प्रकार, राजीव गांधी और सोनिया गांधी का विवाह केवल एक व्यक्तिगत संबंध नहीं था, बल्कि यह भारतीय राजनीति की धारा को भी प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण पल था।
करियर की शुरुआत
राजीव गांधी ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय टूरिज्म सेक्टर में एक पायलट के रूप में की। यह उनके लिए एक रुचिकर पेशा था, लेकिन उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि ने उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित किया। 1980 में उनके छोटे भाई संजय गांधी के आकस्मिक निधन के बाद, राजीव ने राजनीति में प्रवेश किया।
प्रधानमंत्री का कार्यकाल
राजीव गांधी ने 1984 में प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, जब उन्हें इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सत्तासीन किया गया। उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए:
तकनीकी और सूचना क्रांति
राजीव गांधी के शासनकाल में भारत में सूचना प्रौद्योगिकी और संचार के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए। उन्होंने कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिससे भारत तकनीकी जागरूकता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया।
शिक्षा का विकास
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सुधार किए। राजीव गांधी ने स्कूल और उच्च शिक्षा की प्रणाली को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं लॉन्च कीं, ताकि हर युवा को उसकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके।
सामाजिक मुद्दे
राजीव गांधी ने सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण के लिए भी कई प्रयास किए। 1985 में उन्होंने महिला आरक्षण बिल का प्रस्ताव रखा, जिससे महिलाओं को राजनीति में अधिक भागीदारी मिल सके।
चुनौतियाँ और असफलता
राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान कई चुनौतियाँ भी आईं। 1984 में सिख दंगे, बोफोर्स घोटाला और आर्थिक विकास की धीमी गति उनके लिए कठिनाइयाँ थीं। इन घटनाओं ने उनकी लोकप्रियता को प्रभावित किया और 1989 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
राजीव गांधी का श्रीलंका में शांति रक्षक मिशन
राजीव गांधी का प्रधानमंत्री कार्यकाल भारत के लिए कई महत्वपूर्ण परिदृश्यों को लेकर आया। इनमें से एक था श्रीलंका में भारतीय सशस्त्र बलों की तैनाती, जिसे 1987 में भारतीय शांति रक्षक बल (IPKF) के रूप में जाना गया। यह मिशन श्रीलंका के गृहयुद्ध के दौरान हुआ, जिसका उद्देश्य लंका के तमिल लोगों को समर्थन देना और वहां शांति स्थापित करना था।
पृष्ठभूमि
1980 के दशक में, श्रीलंका के तमिल जनसंख्या और सरकार के बीच संघर्ष गहरा हो गया था, जो तब हिंसक रूप ले चुका था। तमिल टाइगर्स (LTTE) जैसे संगठन ने स्वतंत्र तमिल ईलम की मांग की। इस परिस्थिति के निपटारे के लिए राजीव गांधी ने श्रीलंका में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया।
शांति समझौता
1987 में, भारत और श्रीलंका के बीच एक शांति समझौता हुआ, जिसे “इंडीया-श्रीलंका शांति समझौता” कहा जाता है। इसके अनुसार, भारत ने श्रीलंका में शांति रक्षक बलों को भेजने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य वहाँ के तमिल नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना और शांति स्थापित करना था।
मिशन का कार्य
भारतीय शांति रक्षक बल (IPKF) ने श्रीलंका में कई कार्य किए:
- सुरक्षा: IPKF ने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रों में गश्त और निगरानी की।
- मानवीय सहायता: भारतीय बलों ने स्थानीय लोगों को मानवीय सहायता प्रदान की, जिसमें खाद्य वस्तुएं, चिकित्सा सेवाएं और आश्रय शामिल थे।
- संघर्ष समाप्त करना: IPKF का मुख्य उद्देश्य LTTE के साथ संघर्ष को समाप्त करना और शांति स्थापित करना था, लेकिन यह कार्य पूर्ण नहीं हो सका।
चुनौतियां और परिणाम
मिशन के दौरान IPKF को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। LTTE ने भारतीय बलों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा, जो लंबा और कठिन हो गया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय बलों को नुकसान उठाना पड़ा और यह मिशन विवादास्पद बन गया। अंततः, 1990 में भारतीय शांति रक्षक बलों को श्रीलंका से वापस बुला लिया गया।
विरासत
राजीव गांधी का श्रीलंका में शांति रक्षक मिशन एक चौराहा साबित हुआ। यह भारतीय विदेश नीति, सेना की भूमिका और दक्षिण एशियाई राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। हालांकि यह मिशन कुछ सफलताओं के साथ-साथ विफलताओं का भी सामना करता है, यह इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बना हुआ है। राजीव गांधी के दृष्टिकोण ने भारत के लिए एक नई भूमिका को रेखांकित किया, जिसमें न केवल विचारशीलता बल्कि सक्रियता भी शामिल थी।
मृत्यु और विरासत
राजीव गांधी का 21 मई 1991 को तमिलनाडु में एक बम विस्फोट में निधन हो गया। उनकी हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया और उन्हें एक राजनीतिक शहीद के रूप में याद किया जाने लगा।
राजीव गांधी की विरासत आज भी जीवित है। उनकी दृष्टि ने भारत को एक तकनीकी और आर्थिक शक्ति के रूप में उभारा और वे युवाओं में एक प्रेरणा बने रहे।
निष्कर्ष
राजीव गांधी का जीवन और कार्य भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई प्रेरणादायक कदम उठाए, जो आज भी भारत के विकास में सहायक हैं। उनका योगदान भारतीय समाज को सशक्त करने में महत्वपूर्ण रहा है।
इस प्रकार, राजीव गांधी ने न केवल भारतीय राजनीति में बल्कि समाज में भी अपनी एक अनूठी छाप छोड़ी है, जिसे हमेशा याद किया जाएगा।











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