नवमी नवरात्र : माँ सिद्धिदात्री

नवमी नवरात्र : माँ सिद्धिदात्री

नवरात्र के अंतिम दिन, नवमी पर माँ सिद्धिदात्री की पूजा का विशेष महत्व है। माँ सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का एक रूप हैं और यह शक्ति प्रदान करने वाली देवी मानी जाती हैं।

पूजा विधि

  1. स्नान एवं शुद्धता: सुबह स्नान करके शुद्धता का ध्यान रखें।
  2. माँ का आवाहन: दीप जलाकर माँ का आवहान करें और उनके मंत्र का जाप करें।
  3. भोग एवं प्रसाद: माँ को मिठाई, फल और विशेष पकवान भोग के रूप में अर्पित करें।
  4. आरती: अंत में माँ की आरती करें और भक्तिपूर्वक प्रार्थना करें।

इसलिए कहलाती हैं सिद्धिदात्री
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। मां सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था, इसी कारण वह लोक में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता,सर्वत्र विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

मां का स्वरूप
सिंह पर सवार, कमल पुष्प पर आसीन, अत्यंत दिव्य स्वरूप वाली मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनके दाहिने तरफ के नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा और बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप माना गया है जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

मां सिद्धिदात्रीपूजा मंत्र
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

ऐसे प्रकट हुईं देवी सिद्धिदात्री 
कथा में वर्णन है कि जब दैत्य महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव और भगवान विष्णु के पास पहुंचे।तब वहां मौजूद सभी देवतागण से एक तेज उत्पन्न हुआ और उसी तेज से एक दिव्य शक्ति का निर्माण हुआ, जिसे मां सिद्धिदात्री कहा जाता है। दुर्गासप्तशती में उल्लेख है कि भगवान शिव के तेज से देवी का मुख, यमराज से देवी के बाल, विष्णु जी से वक्षस्थल, इंद्र से कमर, वरुण से जंघा, ब्रह्मा जी से दोनों पैर, सूर्य से पैर की उंगलियां, वायु से हाथों की उंगलियां, कुबेर से देवी की नाक, प्रजापति से देवी के सुंदर दांत बने।सभी देवताओं ने अपनी शक्ति को मिलाकर देवी को अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इस तरह से माता ने महिषासुर का अंत किया।

मां सिद्धिदात्री की आरती

जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता।
तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।
जब भी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।
तू जगदम्बें दाती तू सर्व सिद्धि है॥

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥

तू सब काज उसके करती है पूरे।
कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।
जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली॥

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।
महा नंदा मंदिर में है वास तेरा॥

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।
भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥

महत्व

माँ सिद्धिदात्री का पूजन करने से जीवन में समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपने कार्यों में सफलता की कामना रखते हैं।

भक्तों के लिए यह अवसर माँ के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का भी है। इसके माध्यम से आकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है।

इस नवमी पर माँ सिद्धिदात्री का आशीर्वाद प्राप्त कर, जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लें।

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